जलते मकान से गुजरती है कविता!

· Indore

जलते मकान से गुजरती है कविता!

‘अगर आप कहते हैं कि गद्य का मतलब है ऐसा मकान खड़ा करना, जिसमें रहा जा सके तो मैं कहूंगी कविता उस परिंदे की तरह है, जिसे हाथ में सहेज कर जलते मकान से गुजरते हैं।’ बात कुछ अलग, पर सुनी-सी लगती है। ‘इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’ इश्क हो या कविता, गुजरना आग से ही है। बच कर नहीं निकला जा सकता, बचे तो गुजरे नहीं। झुलसे बगैर ना इश्क किया जाता है, ना लिखी कविता जा सकती है। अग्नि-स्नान की तरह होती है कविता। प्रेम में भी तो लपटें निकलती हैं, तपता है तन और मन। दिल है तो तड़पने का बहाना कोई ढूंढे। कविता होगी भीतर तो तड़पाएंगे, झुलसाएगी। विरह से उपजा होगा गीत, महादेवी वर्मा ने लिखा था।

कविता, जैसे जलते मकान के भीतर गुजरती जिंदगी। कविता आकस्मिकता की मांग करती है। फौरन से पेश्तर, जो कुछ कहना है, कह दीजिए और निकल जाइए। साहित्य का नोबेल कनाडा की जिस लेखक को दिया गया, वह भी यही कहती हैं। एनी कार्सन (76)। बिलकुल माफिक सम्मान के लिए। बड़ा पुरस्कार, बड़ा जीवन मांगता है। फुटपॉथ की खरीदारी नहीं है नोबेल। ज्ञानपीठ पर भी सवाल उठे हैं, नोबेल पर नहीं उठते। साहित्य के नोबेल पर तो बिलकुल नहीं।

अफवाह, विवाद, लानत-मजम्मत, छींटाकशी, वाद-अपवाद से ऊपर है साहित्य का नोबेल पुरस्कार। हर अगर-मगर से परे, पक्ष-विपक्ष से बाहर। सुपर से भी ऊपर। बॉब डिलन के वक्त थोड़ी गहमागहमी थी, निपट गई, पटरी पर आ गई। इस बार के नोबेल शांति पुरस्कार ने डोनाल्ड ट्रंप की बोलती बंद की है और साहित्य के नोबेल ने ‘छई छप छई छपाक छई’ छाप छपासबाजों के सवालों का जवाब दे दिया है। यूं ही नहीं मिल जाता सुनहरा सम्मान। कुछ भी नहीं, जिसकी पर्दादारी है। सौ फीसद काबिलियत। हर तरह से मुकम्मल प्रतिभा पाती है असली तारीफ।

एनी कार्सन आग के दरिया से गुजरी हैं। जलते मकान से परिंदे को बचाकर लाईं, तब मिला नोबेल, महिला हैं, इसलिए नहीं। कला की दुनिया में रिजर्वेशन नहीं मिलता। शायद कभी वह दिन भी आ जाए, पर कला की रात होगी। राजनीति कीमत वसूलती है। साहित्य कीमत चुकाता है। दावं पर लगा देता है जीवन। तीस बरस पहले एनी कार्सन ने अपनी मां को खोया था। उनका कविता है मां पर- द थ्रेड वी लॉस्ट। कविता संग्रह का नाम है- मैन इन ऑफ आवर्स। लिखती हैं- लेखक पहले उदासी को कपड़े की तरह जिस्म पर पहनता है, फिर कलम थामता है। दु:ख वेशभूषा है, रचना की। मां पर उनकी कविता है- खिड़कियां सुबह की ओर खुलने से पहले/तुम खामोश कमरे की तरह थीं/मैं इसी खामोशी में पली और बड़ी हुई/तुम्हारे दिल की धड़कनों की लय को जानते-समझते हुए/इसके पहले कि मैं जानबूझ पाती/खुद अपना नाम/अपनी शिनाख्त/अब सिर्फ वक्त है हमारे बीच/नदी की तरह बहता हुआ/खालिस अंतराल/मैं जब भी पानी का गिलास/उठाने के लिए हाथ बढ़ाती हूं/तुम्हारा हाथ भी होता है/मेरे हाथ के साथ... हर बार।

बात समझ में आई, क्यों नहीं मिलता किसी देसी रचनाकार को इतना शानदार सम्मान? टैगोर के बाद से खाली हाथ हैं हम। गाल बजाते हैं, भारतीय लेखक। ताल पर नाचते हैं, शोहरत की। ढाल बनाते हैं, सियासत को।

जलते मकान से कौन गुजरना चाहता है। हिंदुस्तानी रचनाकारों को आग लगाने से फुर्सत नहीं, परिंदा क्या बचाएंगे। एनी कार्सन की एक और बात पर गौर कीजिए- ‘तुम भागते हो पसीने में लथपथ, सांस में सांस नहीं रहती... तब रची जाती है कविता।’ उनकी किताब है- ऑटोबायोग्राफी ऑफ रेड। लाल रंग की आत्मकथा पर यह जीवनी नहीं है लेखक की। दु:ख का आखिरी बयान है। दर्द की सिल्ली पर सूखती, नश्तर की तरह तेज होती जिंदगी। एनी कार्सन ग्रीक साहित्य की अध्यापक रही हैं। कनाडा के स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाया, फिर अनुवाद की दुनिया में उतर आईं। महान ग्रीक कवि साफो की कविताओं की अनुवाद किया। नोबेल कमेटी ने पहली बार किसी लेखक के अनुवाद को भी पुरस्कार के लिहाज से काबिलेगौर माना। आमतौर पर अनुवाद साहित्य के लिहाज से सबसे निचली पायदान पर रहता है। नोबेल छोड़िए, गली-मोहल्ले के पुरस्कार भी नहीं मिलते। एनी कार्सन इसकी अपवाद बनीं।

कविताएं लिखती हैं, पर साहित्य की ऐसी कोई विधा नहीं, जिस पर उनकी पकड़ ना हो। वह ऑपेरा, निबंध, उपन्यास लिख चुकी हैं। अकादमिक जीवन भी उनका भरा-पूरा रहा है। ‘इरोज-द-बिटरस्वीट किताब’ में वह प्यार की ऐतिहासिक पड़ताल करती हैं। प्रेम उस आईने की तरह है, जिसमें शब्द अपने मतलब खोलता है। ‘ग्लास, आयरनी एंड गॉड’ में लिखती हैं- मां ने कहा, तुम सोचती बहुत ज्यादा हो। बहुत याद रखती हो। आखिर किसलिए... पीछा क्यों नहीं छुड़ा लेतीं? मैंने कहा- आप बताइए, कौन-सी जगह है दुनिया में, जहां मैं प्यार, यादें, भीतरी संसार उतार कर रख सकती हूं।

‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ रेड’ में उन्होंने लिखा है- ‘शब्द भी उछलते-कूदते हैं बच्चों की तरह, बस, अगर आप उन्हें खुलकर खेलने-कूदने का मौका दें।’ जीवन दु:ख का उत्सव है, शायद एनी हमसे यही कहना चाहती हैं। जो मिल गया, उसी को मुकद्दर समझ लिया। शब्द जितने भी आपके पास हैं, जलते दुनिया के बाजार से बचा कर ले जाए जा सकते हैं। बस उन्हें कविता की शक्ल में ढाल लीजिए।