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करीब हजार का हॉल...पचास भी हाजिर नहीं!
ठीक है, साहित्य का समारोह है तो कविता -कहानी-उपन्यास पर ही बात होंगी लेकिन साहित्य समाज का दर्पण हैं और अगर कलम मौजूदा हालत पर नहीं चल रही तो समझ लो धार भोथरी हो गई है। वाणी प्रकाशन के साहित्य उत्सव में पहले दिन यही लगा...! एक भी ऐसी बात सुनने को नहीं मिली जिसमें मौजूदा दर्द हो, दर्द सहने वाला हो, दर्द न ही सही, दर्द देने वाला तो हो, वो भी नहीं था. जैसे लिखने वालों को कोई सरोकार ही नहीं हैं, रामधारी सिंह दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ में लिखा था ‘जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।’ बहरहाल, अदिति माहेश्वरी और सत्य व्यास की बातचीत से लेखन में करियर बनाने वालों की तकलीफ आई। कह रहे थे लेखन में करियर बनाना मुश्किल हैं, हमारे बोकारो में आई आईटी का माहौल है, हर कोई 12वीं बाद उसी की तैयारी करता हैं... जब मेरी पहली किताब मशहूर हुई और उसके बारे में इंडिया टुडे में छपा तो पिताजी का फ़ोन आया। पूछा- क्या छपा है तुम्हारे बारे में, मैंने कहा - पत्रकार कुछ भी लिख देते हैं। सत्य आगे कहते हैं ये हालात तब थे, जबकि घर पर पढ़ने-पढ़ाने का माहौल था। 35 साल की उम्र में मेरी पहली किताब आई और 16- 17साल की उम्र से में पढ़ रहा हूं। फिल्मों में लिखते हैं, कहते हैं ‘फ़िल्मी दुनिया लेखकों को इंतज़ार नहीं करवाती, उन्हें सम्मान देती हैं, बस आपकी कहानी में नाटकीय बदलाव कर देते हैं, किताब में कहानी आपकी मर्जी से बदलती