सियासत में विजयवर्गीय का ‘ज्यादा बोलना’ बना परेशानी का सबब

मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को जानने वाले मानते हैं कि वे भले बदजुबान हों… महिलाओं के लिए गलत नहीं बोलते हैं! कभी उन्हें बातचीत में भी महिलाओं के लिये गलत बोलते नहीं सुना गया। ऐसे भाजपाई हैं, जिनसे महिलाएं बड़़ी तादाद में सबसे पहले जुड़ीं। आशा विजयवर्गीय का योगदान ज्यादा रहा, महिलाओं के दम पर अजेय रहे। महिलाओं के कारण ही विपरीत हालात में भी राजनीति बेअसर रही। जितनी सीट से उन्होंने जीतने का रिकार्ड बनाया है, बगैर महिला वोटरों के संभव नहीं था। पार्षद संध्या यादव के बारे में बोलते समय भी भाव गलत रहा होगा, यह विरोधी भी नहीं मान सकते। दरअसल, विजयवर्गीय ज्यादा और फालतू बोलने से संकट में आते हैं। उन्हें कम और नपा-तुला बोलना चाहिए। यदि ऐसा करते तो प्रदेश के मुखिया हो जाते। जिस तरह महेश जोशी और सुरेश सेठ अनर्गल बोलकर खर्च हुए, वैसे ही भाजपा में विजयवर्गीय हैं। सुमित्रा महाजन से सीखना चाहिए कि किस तरह खामोशी से काम किए जाते हैं। यदि दिग्विजयसिंह फिजूल बकवास नहीं करते, तो किनारे होते? कुछ दिन विजयवर्गीय को खामोश रहना चाहिए। विरोधियों को खुलेआम निपटाने की आदत ने उन्हें ही निपटा दिया।