गणित का देश-परदेस…!

राहुल गांधी के विदेश जाने से यदि कांग्रेस हार जाती है तो नरेंद्र मोदी के जाने से भाजपा कैसे जीत जाती है? गांधी तो साल में एक-दो बार जाते हैं और मोदी तो जाते ही रहते हैं! गांधी एक बार जाकर भी ‘टूरिस्ट’ नेता हो जाते हैं और लगातार जा रहे मोदी इस आरोप से बचे रहते हैं। गृहमंत्री अमित शाह का दावा है कि वे विदेश नहीं जाते हैं, तो भाजपा जीतती रहती है और अगले तीस बरस हराना मुश्किल। मुकाबला तो मोदी और गांधी के बीच है, फिर शाह के विदेश नहीं जाने पर कैसे वोट मिल रहा है! जो शख्स मुकाबले में है ही नहीं, वोट उसे मिल रहे हैं! वह भी विदेश नहीं जाने पर! किसी चुनाव में विदेशी टूर मुद्दा रहा ही नहीं, तो नतीजा कैसे माना जा सकता है। मोदी के सैर-सपाटे जरूर मजाक का सबब रहे हैं, चुनाव का मुद्दा नहीं रहे, इसलिए शाह के दावे में जरा दम नहीं! यह दावा उलटे चुनाव आयोग का दम फुला रहा है कि कोई अगले तीस बरस जीत का दम कैसे भर रहा है, जबकि आयोग के कामकाज पर सवालिया निगाहें हैं। यही अचरज तो है कि जमीन पर भाजपा की लहर दिखती नहीं और मशीनों से सुनामी निकलती है! हकीकत में मतदाता सरकार के खिलाफ मुखर नजर आता है और नतीजा विपक्ष का सूपड़ा साफ दिखाता है। समझना मुश्किल हो जाता है कि भारी महंगाई, भ्रष्टाचार, घोटाले, बेरोजगारी और सामाजिक पक्षपात के बावजूद भाजपा की बम्पर जीत कैसे हो गई?
महाराष्ट्र, बिहार, दिल्ली और हरियाणा के नतीजे से खुद भाजपाई भौचक थे कि ऐसा वोटर के रुख से तो नजर नहीं आ रहा था। जिस उम्मीदवार को वोटर ने जनसंपर्क में खदेड़ा, उसका रिकार्ड वोटों से जीतना शायद अमित शाह के विदेश नहीं जाने का नतीजा ही हो सकता है! जब चुनाव आयोग शंका के घेरे में है और बहूत सारे सवाल, जवाब का इंतजार कर रहे हैं, इस तरह के दावे भरोसा ही कम कर रहे हैं। अभी भी वोटों की छंटनी और मतदान का बार-बार बढ़ता फीसद शंका दूर नहीं कर पाया है कि आयोग को निष्पक्ष मानें। आरोप आयोग पर लगते हैं और जवाब भाजपा से आते हैं, इतना ही काफी है, भरोसा दरकाने के लिए। यदि तीस बरस जीत तय ही है, तो चुनाव की जरूरत ही क्या?