कहां-कहां से गुजर गया…

· Indore

कहां-कहां से गुजर गया…

‘रोजा’ में जिस चेहरे को देखकर लोग ठहर जाते थे, एक दौर ऐसा भी आया जब उसके लिए अपने पैरों पर खड़े होना मुश्किल हो गया। अरविंद स्वामी फिल्मों से दूर होकर कारोबार में जुटे थे। तभी एक हादसे में उनकी रीढ़ को चोट लगी और पैर में आंशिक लकवा हो गया। दोबारा पैरों पर खड़े होने में चार से पांच साल का इलाज लगा। कसरत नहीं कर सकते थे इसलिए वजन भी बढ़ गया। पर्दे पर लौटने से पहले उन्हें अपनी सेहत संभालनी थी।

अरविंद को फिल्मों में मणिरत्नम लाए थे। ‘थलपति’ (1991) से शुरुआत हुई लेकिन अगले ही साल आई ‘रोजा’ ने उन्हें देशभर में पहचान दिला दी। फिर ‘बॉम्बे’ आई और उनका चेहरा हिंदी दर्शकों के लिए भी अपना हो गया। दिलचस्प बात यह है कि अरविंद अभिनेता बनना ही नहीं चाहते थे। उनका मन डॉक्टर बनने का था जबकि पिता चाहते थे कि वे कारोबार करें। पढ़ाई भी उसी तरफ हुई लेकिन रास्ता फिल्मों की ओर मुड़ गया।

करीब 2000 में उन्होंने अभिनय से दूरी बनाई और कारोबार पर ध्यान देने लगे। उनका इरादा कुछ साल बाद फिल्मों में लौटने का था। वे कई कंपनियों में जिम्मेदारियां संभाल चुके थे। आगे चलकर ‘टैलेंट मैक्सिमस’ शुरू की जो दूसरी कंपनियों के कर्मचारियों की तनख्वाह और उनसे जुड़े काम संभालती है। कंपनी की वेबसाइट पर आज भी उनका नाम संस्थापक और चेयरमैन के तौर पर दर्ज है।

इसी बीच हादसे ने जिंदगी की रफ्तार बदल दी। लंबे इलाज के बाद जब फिल्मों की बात फिर चली तो अरविंद के मन में झिझक थी। मणिरत्नम से एक मुलाकात में उन्होंने अपने बढ़े वजन और पहले झेले दर्द का जिक्र किया। उन्हें डर था कि शरीर दोबारा वह सब सह पाएगा या नहीं। फिर भी कोशिश के लिए तैयार हुए। जिस निर्देशक ने पहली बार कैमरे के सामने खड़ा किया था उसी की फिल्म ‘कडल’ से 2013 में वापसी हुई।

वापसी को असली मजबूती 2015 की ‘थनी ओरुवन’ से मिली। इस बार अरविंद रोमांस करने वाले हीरो नहीं बल्कि खलनायक थे। उस किरदार ने उनके लिए नए रास्ते खोल दिए। बाद में ‘बोगन’, ‘चेक्का चिवंथा वानम’, ‘मेयाझगन’ और ‘आईसी 814: द कंधार हाईजैक’ जैसे काम आए। ‘रोजा’ से पहचान बनाने वाले अरविंद ने लंबे अंतराल के बाद अलग किरदारों के साथ जगह फिर बनाई।