आवाज से आवाज मिली... और गूंज उठी

· Indore

आवाज से आवाज मिली... और गूंज उठी

पुणे में जब राहुल गांधी की गूंज हुई तो सारा वजन विश्वजीत कदम पर था, जो कांग्रेस विधायक और भारतीय विद्यापीठ के मालिक हैं। सैकड़ों-हजारों बच्चे पढ़ते हैं और कांग्रेसियों ने पूरा ताना-बाना इसी के इर्द-गिर्द बुन लिया था। पुणे एजुकेशन हब है। इसके बाद ही इंदौर का नाम आया। वैसे आया नहीं, लाया गया।

जीतू पटवारी ने राहुल गांधी से कहा कि इंदौर में गूंज कर दीजिए। पुणे की कामयाबी से गद्गद् दिल्ली टीम के लिए इजाजत देना आसान नहीं था। कुछ जतन के बाद आखिरकार माने। मौका-मुआयना करने टीम को इंदौर भेज दिया, जिन्होंने अलग-अलग तरह से जांचा-परखा और नतीजा निकाला कि अगर पुणे के आसपास भी गूंज हो गई तो कामयाब मान लिया जाएगा। फिर पुणे तो राहुल की टीम गई थी और इंदौर बुलाई गई थी, इसलिए दबाव था कि खुद ही तराजू में आ गए थे।

सबसे बड़ा मामला सरकार से निपटना था। तभी बारह सितंबर की तारीख फेंकी गई, जबकि उन्नीस पहले से लॉक थी। वैसे कांग्रेसी मुगालते भी इसमें ढूंढे जा सकते हैं कि दिल्ली यूनिवर्सिटी का नतीजा उन्नीस को आ रहा था और राहुल की टीम को लगा कि जीत का जश्न भी इंदौर में ही मना लेंगे। खैर, बारह के जरिए देखना चाहते थे कि सरकार कितनी बारह बजाती है। कुछ दिक्कतों के बाद रास्ता बनने लगा तो उन्नीस का ऐलान हो गया। चूंकि पटवारी ने खुद गूंज मांगी थी, इसलिए सब उनके माथे था और पहले दिन समझ आ गया था कि किसी के भरोसे नहीं रहा जा सकता। काम सबसे लेना है, लेकिन गड़बड़ हुई तो दाम अकेले देना है।

चुनौती सिर्फ छात्रों तक बात पहुंचाने की नहीं थी। पंडाल में लाने की भी थी और दिल्ली टीम से निपटना था, जो किसी की चलने ही नहीं दे रही थी। पंडाल उनकी मर्जी का बना और लंबाई-चौड़ाई भी उन्होंने तय की। हालांकि पुणे से बड़ा था और शुरुआत में ही टीम को पता चल गया था कि इंदौर में क्या कुछ होने वाला है, पर जितना बड़ा पटवारी चाहते थे, उतना नहीं होने दिया, क्योंकि डर था कि खाली रह सकता है। बरसों से इंदौर में कांग्रेस ने ऐसा कुछ किया नहीं था, जिसे दिल्ली को दिखाकर दावा किया जा सके कि कर चुके हैं। फिर कांग्रेसियों का रिकॉर्ड ठीक नहीं था कि अकसर मौके पर हाथ ऊंचे करते रहे हैं, इसलिए पटवारी को कुछ अलग करना था और गूंज में सबकी आवाज मिलाना थी। राहुल गांधी से सीधी रजामंदी मिली थी और पहली मीटिंग में ही उनकी टीम हाजिर थी।

अब दो मोर्चों पर काम शुरू हुआ। एक तरफ एनएसयूआइ, युवा कांग्रेस और महिला कांग्रेस को लगाया और इंदौर को पैंतीस क्लस्टर में बांट दिया। इतने ही नेताओं को तैनात किया। निशाना स्कूल, कोचिंग, यूनिवर्सिटी, लाइब्रेरी, हॉस्टल और बारहवीं तक के स्कूल थे कि यहीं से लाना था। इससे पहले इंदौर कांग्रेस कई बार राहुल गांधी और दूसरे बड़े नेताओं के लिए भीड़ करती रही है, इसलिए डर था। फिर उम्र का बंधन था और गाड़ियां भरकर बस्ती या गांव से भीड़ नहीं कर सकते थे। काम बड़ा था और राहुल गांधी की टीम मानकर चल रही थी कि जैसे-तैसे पंडाल तो भर लेंगे, पर रजिस्ट्रेशन का जो खेल शुरू हुआ, उसने माहौल बदल दिया।

इसके अलावा गूंज से पहले कांग्रेसियों की आवाज पंद्रह-बीस हजार छात्रों तक तो पहुंच गई थी और जिस तरह प्रोग्राम हो रहे थे, वैसे तो कोटा से लेकर पुणे तक नहीं हुए थे। सब जगह पंडाल था और तमाशे थे, लेकिन इंदौर में हर दिन अलग-अलग तमाशे थे और हर जगह नेता तैनात कर दिए गए थे। जात-पात की सियासत थी कि जिस हॉस्टल में जिस बिरादरी के बच्चे थे, वहां उन्हीं नेताओं को काम पर लगाया गया और उसका नतीजा आया। सबको कहा कि दो-दो इंचार्ज बनाने हैं, जो रजिस्ट्रेशन कराएंगे। फिजिकल फॉर्म भरवाए गए।

पूरा मॉनिटरिंग सिस्टम था कि कौन, कहां जा रहा है। हर बंदे को कम से कम दस इवेंट करने की जिम्मेदारी दी गई। बचे कांग्रेसियों को कहा गया कि वार्डों में जाना है, घर-घर बच्चों का रजिस्ट्रेशन कराना है और गूंज के बारे में बताना है। सबको चार-पांच बच्चों को जोड़ने को बोला गया। साथ ही तय किया कि पब्लिसिटी किस तरह होगी, ऑनलाइन प्रचार कैसे होगा और युवाओं को कैसे जोड़ा जाएगा। पंद्रह नेताओं को जिम्मेदारी दी गई कि युवाओं में जाकर माहौल बनाना है। इनमें उमंग सिंघार, जयवर्धन सिंह, विक्रांत भूरिया, हनी बघेल, सचिन यादव, प्रियव्रत सिंह और महेश परमार शामिल थे। सत्यनारायण पटेल और रीना बौरासी को इंदौर से लिया गया। विपिन वानखेड़े को जीतू पटवारी ने अपने साथ खड़ा कर लिया और भाजपाई हमलों की ढाल बनाया कि सबका जवाब उनसे ही दिलवाया गया। जैसे चुनाव में कांग्रेसी सब कुछ कर गुजरते हैं, वैसे ही यहां किया और जिसको जिम्मेदारी दी गई, उसे खाली हाथ नहीं छोड़ा।

जो चाहिए था, हर सामान हाजिर था, लेकिन जैसे-जैसे उन्नीस करीब आई, जीतू पटवारी एंड कंपनी को पता चल गया कि गूंज होने वाली है और किसी तरह की अलग कोशिश की जरूरत नहीं है। खुद से माहौल बन गया है। करीब दो लाख पानी की छोटी बोतलें रखी थीं, ताकि किसी को बाहर ना जाना पड़े। कोई नेता मंच पर नहीं गया। बाहर वाले नेताओं से कहा कि जिनको साथ ला रहे हैं, उन्हें एक वक़्त का खाना देकर लाएं और बाकी बड़ा पंडाल था, जहां पच्चीस हजार की पेट पूजा का इंतजाम था। सोशल मीडिया पर बड़ी टीम लगी थी, जो भोपाल और इंदौर दफ्तर से चल रही थी।

हर दिन नया कुछ सामने आ रहा था। नेताओं को काबू में रखना बड़ी चुनौती थी, जिन्हें पहले दिन से आखिर तक दिल्ली टीम से डराया गया कि गड़बड़ की तो खैर नहीं है और दावं कारगर रहा कि कोई मंच के आसपास गया ही नहीं। इंदौर की कामयाबी ने राहुल गांधी की टीम को सिर्फ खुश नहीं किया है, परेशान भी कर दिया है कि इस गूंज को दूसरी जगह दोहराना आसान नहीं रहने वाला है, क्योंकि अब बात पुणे की नहीं, इंदौर की हो रही है!