शावक की मौत सवाल के घेरे में

कूनो में शिकारी की गोली से शावक की मौत (या हत्या) पर पशु-प्रेमी अजय दुबे का कहना है कि शिकारियों को लोकेशन कैसे मिली। 10 लाख रुपए का कॉलर-आइडी चीतों के गले में है। उसे ही लोकेशन पता होती है, जिसके मोबाइल से जुड़ा हो। चुनिंदा अधिकारियों को ही पता रहता है।
दुबे का सवाल ये भी है कि जब गोली मारी गई, तब ट्रैकिंग-टीम कहां थी। जिस भरमार बंदूक से गोली चली है, उसका शोर एक किलोमीटर तक होता है। क्या सभी ने कान में रूई डाल रखी थी?
जब कूनो में ही हाइटेक अस्पताल होने का दावा है, तो घायल शावक को 500 किलोमीटर दूर जबलपुर के अस्पताल क्यों ले जाया गया? जरूरी भी था, तो हेलिकाप्टर से क्यों नहीं ले गए? करोड़ों रुपए के प्रोजेक्ट का दावा है, तो फिर कोशिश में कमी क्यों? शक तो ये भी है कि मौके पर ही शावक की मौत हो गई। चीता बेहद नाजुक होता है। उसे आसानी से घाव लगता है, जो नासूर बन जाता है।
दुबे का कहना है, कोई बीमारी तो थी नहीं, जिसके इलाज के लिए जबलपुर रैफर किया। गोली ही निकालना थी, तो क्या कूनो के अस्पताल में कोई सर्जन मौजूद नहीं था? कूनो में हो रही मौतों में लापरवाही है या मिलीभगत…? तकनीकी जानकार इस शिकारी-गैंग का हिस्सा हो सकते हैं, जिन्होंने कूनो का सिस्टम हैक कर लिया है। उन्हें पता चल रहा है कि चीते कहां, किस हालत में हैं।
बताते हैं, अधिकारी जवाब नहीं दे पा रहे हैं कि मौत कब हुई, निगरानी टीम कहां थी, इलाज में चूक क्यों हुई? पोस्टमार्टम रिपोर्ट अब तक आम क्यों नहीं की गई? जिम्मेदार अधिकारी का नाम क्यों नहीं सामने आ रहा?