पांच करोड़ का दु:ख!

पैसा आदमी की जेब भर सकता है, जिंदगी की समझ नहीं। पांच करोड़ जीतने के बाद पहचान आई, लोग आए, हर महीने हजारों रुपये बांटे, लेकिन धीरे-धीरे सुकून चला गया। उस चमक से बाहर निकलने में बारह साल लग गए।
जब बिहार के मोतिहारी के सुशील कुमार ने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में पांच करोड़ रुपये (2011) जीते थे। आम नौजवान रातोंरात करोड़पति बन गया था। पैसा आदमी की जेब भर सकता है, जिंदगी की समझ नहीं। सुशील के साथ भी यही हुआ। पांच करोड़ जीतने के बाद उनके पास पैसा आया, पहचान आई, लोग आए और धीरे-धीरे सुकून चला गया, जो शायद पांच करोड़ मिलने से पहले ज्यादा था।
टैक्स कटने के बाद सुशील के हाथ करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये आए थे। वे छोटी नौकरी करते थे, पढ़ाई कर रहे थे। पांच करोड़ मिलने के बाद अचानक दुनिया बदल गई। हर जगह बुलावे आने लगे। कार्यक्रम, सम्मान, मुलाकातें और नए-नए लोग। हर नया आदमी शुभचिंतक बनकर नहीं आया था। कुछ सलाह लेकर आए, कुछ कारोबार लेकर आए और कुछ सिर्फ यह सोच कर आए कि पांच करोड़ की नदी बह रही है, तो भर लिया जाए।
सुशील ने बताया कि अलग-अलग कामों में पैसा लगाने लगे। कई जगह नुकसान हुआ। मदद मांगने वालों को भी खूब पैसा दिया। एक समय ऐसा भी आया, जब हर महीने हजारों रुपये बांट रहे थे। नेकदिली अच्छी बात है, मगर मुश्किल यह नहीं थी कि पैसा इधर-उधर जा रहा था, असली दिक्कत यह थी कि उन्हें खुद भी समझ नहीं आ रहा था कि जिंदगी में करना क्या है।
दिल्ली आना-जाना बढ़ा तो संगत भी बदली। शराब और सिगरेट की आदत लगी। घर का माहौल खराब हुआ। पत्नी से झगड़े बढ़े और बात रिश्ते टूटने तक पहुंच गई। इसी दौर में एक पत्रकार बार-बार पैसे का हिसाब पूछ रहा था। परेशान होकर सुशील ने कह दिया कि सारे पैसे खत्म हो गए, दो गाय खरीदी हैं और दूध बेच कर गुजारा कर रहा हूं। बस फिर क्या था, यही कहानी फैल गई कि पांच करोड़ जीतने वाला कंगाल हो गया। बाद में सुशील ने साफ किया कि उन्होंने गुस्से में यह बात कही थी। नुकसान हुआ था, परेशानियां आई थीं, मगर कहानी को जैसा बनाया गया, उतनी सीधी भी नहीं थी।
कुछ समय मुंबई भी गए। फिल्मी दुनिया में हाथ आजमाने की कोशिश की, मगर वहां समझ आया कि शायद नया रास्ता खोजने से ज्यादा, उलझी जिंदगी से भाग रहे हैं। कुछ महीने बाद लौट आए। उन्होंने शराब छोड़ी और धीरे-धीरे सिगरेट भी। यहीं से पांच करोड़ वाले सुशील कुमार की जगह फिर वही पुराना लौटने लगा।
इसके बाद उन्होंने पढ़ाई पर ध्यान दिया, शिक्षक भर्ती परीक्षा पास की और पढ़ाने लगे। गांव, परिवार और इलाके से फिर जुड़ गए। पेड़ लगाने, गौरैया बचाने और बच्चों की पढ़ाई में भी समय देने लगे। जब बैंक में करोड़ थे, तब जिंदगी बिखर रही थी और जब आदमी फिर रास्ते पर लौटा, तब सुख वापस मिला।
सुशील कुमार की कहानी उस भ्रम की है, जिसमें मान लेते हैं कि पैसा आते ही जिंदगी बन जाती है। सच यह है कि पैसा अगर समझ से बड़ा हो जाए तो आदमी को बनाता कम, बिगाड़ देता ज्यादा है। केबीसी ने पांच करोड़ रुपए एक रात में दे दिए थे, मगर उस चमक से बाहर निकल सुकून पाने में बारह साल लग गए।