मेवा हो तो… (जन) सेवा होती है!

यह समय जन-सेवा के पच्चीस वर्ष के उत्सव का है। ठीक ही है कि जनता तो नाशुक्री होती है कि कितनी भी सेवा कर लो, उसे भान ही नहीं रहता कि बेचारे को सेवा करते-करते कितने साल हो गये। बताइए, यदि सरकारी विज्ञापन और गोदी-मीडिया ना हो तो कौन मानने को तैयार होता कि ‘महामानव’ ने चौथाई सदी सेवा में गुजार दिए।
यहां मुझे थोड़ी आपत्ति है, कि बाकी बावन साल कहां गये, यदि प्रधान-सेवक की उम्र 77 साल मान लें। यह तो सरासर नाइंसाफी है कि बाकी साल को यहां चाय पिलाने या घर से दूर भटकने के नाम पर जाया कर दें। कहते हैं, सेवा करो तो मेवा मिलता है, हो सकता है, यह सिद्धांत आम जनता के लिए हो और अवतारी के लिए नियम-कायदे अलग हों।
हम तो यही सुनते आए कि सेवा करने से मेवा मिलता है, लेकिन यहां तो मेवा के इंतजार में जनसेवा पूरे बावन साल स्थगित रही। अर्थात् अब से यदि जन को सेवा करवाना है, तो पहले मेवा यानी सत्ता देना होगी।
यह तो गलत बात है कि सरकार में आने के बाद ही सेवा-वर्ष की गिनती हो। इसका तो यह मतलब भी हुआ कि जब तक आप सत्ता में नहीं हैं, जनसेवा का कोई अधिकार ही नहीं है। चने- भुंगड़े खाकर जो प्रचार कर रहे थे, दरअसल जनसेवा नहीं कर रहे थे, क्योंकि जब तक सत्ता नहीं है, तो जनसेवा का क्या मतलब! ‘भूखे भजन ना होई’, जैसा ही मामला है क्या!
पार्टी को जन-सेवा के आंकड़े देते हुए इस बात पर तो माथापच्ची करना ही थी कि बाकी उम्र क्या भाड़ झोंकी है!। क्या पच्चीस से पहले जन-सेवा के बजाय पार्टी-सेवा कर रहे थे या खुद को तैयार करना होता है कि यदि सरकार में आ गये तो फिर जम कर जन-सेवा कर लेंगे। मैं तो इस तरह से देखता रहा हूं कि सेवा का माद्दा है तो शुरू से है, आधी उमर होने के बाद पैदा नहीं होता।
वैसे, पार्टी ने ठीक ही किया कि हाल के पच्चीस साल का जिक्र किया और उतने ही तेल के दीपक जलाए। अगर पूरी उम्र के साल को जनसेवा मान लेते तो पार्टी नेताओं का तो दीये इकट्ठे करने में ही तेल निकल जाता। मुझे तो यह दृश्य बढि़या लगा, कि उन दीयों के बचे तेल से ना जाने कितने गरीबों के घरों में बघार लगाने की गंध और छौंक की आवाज भी सुनाई दी। सोचिये, कितने-कितने भूखे पेट से दुआ निकली होगी कि कम से कम एक बार तो तेल में बघारी सब्जी या दाल खाने को मिली। पच्चीस साल में मजबूरी की यह जनसेवा भी तो कोई कम नहीं है!