चढ़ता सूरज धीरे-धीरे ढल गया!

चटर्जी नाइट मशहूर ऑर्केस्ट्रा था, जिसकी तारीख मुश्किल से मिलती थी। भारी भीड़ उमड़ती थी। चटर्जी नाइट के प्रभात चटर्जी सितारा थे। बड़े-बड़े बाल और ऊंची कद-काठी थी।
इमली बाजार चौराहे पर गणेश उत्सव होते थे। हमने चटर्जी नाइट के लिए चंदा किया, क्योंकि बजट बड़ा होता था। कई दिन पहले चटर्जी ब्रदर्स के शो की तारीख लेने गए थे। इंतजार के बाद प्रभात के छोटे भाई मनोज बाहर आए। एक दिन की रजामंदी मिली। शर्तें बताई गईं और सभी माननी पड़ीं।
हमने कहा कि प्रभात से मिलवा दीजिए। मनोज बोले रिहर्सल चल रही है। पहले बुकिंग फाइनल कीजिए और एडवांस जमा करवाइए। अगर शो फाइनल होता है, उसके बाद ही दादा मिलेंगे। इंदौर में ऐसा कोई कलाकार हुआ है, जिससे बिना एडवांस इजाजत नहीं थी ! कोई चारा नहीं था, इसलिए फौरन एडवांस दिया, एग्रीमेंट साइन हुआ और प्रभात चटर्जी बाहर आए। सिर्फ दो मिनट बात की और चले गए। हम खुश थे कि प्रभात चटर्जी को करीब से देखने का मौका मिला। अब अलग ही जोश था और चटर्जी नाइट का ऐलान कर दिया।
गणेश उत्सव शुरू हुआ और चटर्जी नाइट के शो का दिन आ गया। सारी तैयारियां पूरी थीं। शानदार स्टेज था और उस पर साजो-सामान भी। शो बस शुरू होने ही वाला था कि बारिश हो गई। पहले लगा कि कुछ देर में सब ठीक हो जाएगा, लेकिन रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। हमारी पूरी टीम बेचैन, बेबस और परेशान थी। कुछ की आंखों से बारिश शुरू कर दी। शो कैंसल करना पड़ेगा। आखिरकार मान लिया कि शो नहीं हो सकता।
चटर्जी बंधु पूरा पैसा ले चुके थे। हम सब हताश खड़े थे। तभी मनोज चटर्जी आए और बोले कि परेशान मत हो। प्रभात दादा से बात कर लीजिए, अगली तारीख पर शो कर देंगे। शुरुआत में जो नखरे और अकड़ दिखाई गई थी, उसके बाद तो हमने मान लिया था कि पैसे गए और शो भी नहीं होगा। लेकिन अब राय बदल चुकी थी। कि मजबूरी को समझा जा रहा है और रास्ता निकालने की तैयारी है। हम उनके पास गए और गुजारिश की, लेकिन चटर्जी बंधुओं के पास नवरात्रि के बाद तक कोई तारीख नहीं थी। बड़ी मुश्किल से श्राद्ध पक्ष में मिली। उसी पर चटर्जी नाइट का शो हुआ। जब हुआ तो मंच के चारों तरफ भीड़ थी। रात दो बजे डटे रहे। आज चटर्जी नाइट नहीं है, पर उसकी कव्वाली खूब मशहूर थी, जिसे चटर्जी ब्रदर्स के गायक विकास शिंदे गाते थे- ‘चढ़ता सूरज धीरे-धीरे ढलता है, ढल जाएगा।‘ (जो अजीज नाजा ने गाई थी।) वही कव्वाली चटर्जी नाइट की हकीकत बन गई है कि चढ़ता सूरज धीरे-धीरे ढल ही गया !
गणेश उत्सव आते ही बचपन के वो दिन याद आते हैं, जब पर्दा लगाकर फिल्में दिखाई जाती थीं। रोटी कपड़ा और मकान, दोस्ती उस जमाने की खास फिल्में थीं। इमली बाजार में नकली अदालत लगाती थी। मरीमाता चौराहे पर बप्पी लहरी नाइट ने धूम मचा दी थी। मंच के तीनों ओर भीड़ थी।
एक से बढ़कर एक मिथुन चक्रवर्ती आते थे और खूब बढ़िया डांस और एक्शन होता था। इमली बाजार में ‘नीरज निशा’ हुई थी, जिसमें बड़े-बड़े कवियों के साथ नीरज ने “कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे...” और “फूलों के रंग से...” सुनाई। संदीप सपन, अब्दुल गफ्फार, माया गोविंद, माणिक वर्मा, उस जमाने के जाने-माने कवि थे, जो हर बड़े कवि सम्मेलन में रात-रात भर तर-बतर करते थे।
अब बड़े-बड़े पंडाल हैं, बड़ी-बड़ी गणेश प्रतिमाएं हैं, लेकिन वो बात नहीं है। ज्यादातर पंडाल लगाने लगाने वाले ऐसे हैं, जिन्हें पता ही नहीं है कि इंदौर में कभी क्या-कुछ हो चुका है !
(जैसा गिटार वादक राजेश मिश्रा ने बताया )