कालिख पर लीपा-पोती है!

· Indore

कालिख पर लीपा-पोती है!

भोपाल में चंद्रशेखर तिवारी के साथ जो हुआ है, उसके बाद विरोध के तरीके पर बहस शुरू हो गई है। कालिख पोतने को गलत बताने वाले कह रहे हैं कि अगर किसी समाज का स्वाभिमान आहत हुआ है, तो सवाल पूछिए, विरोध कीजिए, तर्क कीजिए, लेकिन याद रखिए, किसी चेहरे पर कालिख पोत देने से अपने विचारों का चेहरा उजला नहीं हो जाता है। कानून के दायरे में रहकर जवाब मांगा जाना चाहिए। सहमति और असहमति तो होती है, पर इस तरह की हरकत ठीक नहीं है। इसके अलावा बहुत कुछ कहा जा रहा है। बात ठीक है और ऐसा नहीं होना चाहिए, लेकिन चंद्रशेखर तिवारी ने क्या कभी विरोध या असहमति पर इस तरह का कोई रास्ता अपनाया है? किसी के पास कोई ऐसी मिसाल है? जो विचारों की आजादी की बात कर रहे हैं, क्या उन्होंने कभी तिवारी के विचारों को टटोला है, समझा है, देखा है, सुना है? अब चूंकि पंगा दलित बिरादरी से हो गया है, इसलिए माफी मांग रहे हैं। बावजूद इसके, कालिख तो पोत ही दी गई है। वैसे सोशल मीडिया पर हंगामा है और तिवारी का साथ देने के लिए कई सामने आ रहे हैं। उधर भी इसी तरह का मामला है। यानी तिवारी का निशाना तो कहीं और होता था, पर कालिख कहीं और से आ गई है!