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‘चोरों का गिरोह’ कहा था... भारतीय फिल्मी दुनिया को

‘चोरों का गिरोह’ कहा था... भारतीय फिल्मी दुनिया को

भारतीय फिल्मी दुनिया को लेखक जेफ्री आर्चर ने ‘चोरों का गिरोह’ कह दिया था। उनकी किताबों से कहानियाँ उठाकर फिल्में बना ली। न अनुमति ली गई, न भुगतान किया। यह बयान (2015) उस लेखक की शिकायत थी, जिसे अपनी कहानी परदे पर तो दिखी मगर किसी ने पूछा तक नहीं। आर्चर ने दो फिल्मों का नाम लिया; ‘खुदगर्ज’ और ‘लेडीज वर्सेज रिकी बहल’। उनका आरोप था कि ‘खुदगर्ज’ की कहानी ‘केन एंड एबेल’ से ली गई जबकि ‘लेडीज वर्सेज रिकी बहल’ में ‘नॉट अ पेनी मोर, नॉट अ पेनी लेस’ पर बनी है। आर्चर कहानियों पर भारतीय फिल्म या टीवी कार्यक्रम के खिलाफ नहीं थे। उनकी शिकायत पूछे बिना इस्तेमाल से थी। रॉनी स्क्रूवाला से ‘द क्लिफ्टन क्रॉनिकल्स’ को टीवी पर लाने के लिए सलाह मांगी थी।

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धन, धना, धन के मौसम में दन, दना, दन!

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धन, धना, धन के मौसम में दन, दना, दन!

त्योहारी मौसम में बाजार की बड़ी फिक्र है कि कमाई कितनी होगी! ‘शुभ’ से पहले ‘लाभ’ की चिंता है। दिल्ली के दुकानदारों ने कांग्रेस से कहा था कि रामलीला मैदान पर रैली को टाल दें, पर बात नहीं बनी। भाजपा ने जो रैलियां निकालीं, उन्हें घंटे भर में खत्म करने का दावा किया ताकि दुकानदारों का नुकसान न हो। राजनीति भी दुकानदारी ही है। हर पार्टी नफा-नुकसान देख रही है। कांग्रेस को नकली संसद में महाभियोग लगाना है, लेकिन असली संसद में जाने को तैयार नहीं है। भाजपा को रैली का जवाब रैली से ही देना है, जबकि सत्ता में है। त्योहारों पर दुकान बंद होने से दुकानदार परेशान है, धनतेरस पर धन धना धन की जगह दन दना दन के आसार हैं। मनोरंजन की दुनिया को बड़ी उम्मीद है। ‘इंडिया टुडे’ पर पीवीआर-आइनॉक्स के डायरेक्टर संजीव कुमार बिजली कह रहे थे कि बॉक्स ऑफिस पर जबर्दस्त कमाई होगी। पांच नवंबर को ‘रामायण’ रिलीज होते ही दो सौ करोड़ की आमदनी होगी। ‘रामायण’ पर ‘इंडिया टुडे’ ने भी एआइ से ‘रघुपति राघव राजा राम’ बनाई है। खबरिया चैनलों पर एआइ से बने राम और सीता की तस्वीर भी हैं। सनी देओल को हनुमान बनाने की भी होड़ है। रामानंद सागर की ‘रामायण’ के राम अब दशरथ बने बैठे हैं। फिल्म ‘रामायण’ में रणबीर कपूर (राम) और सई पल्लवी (सीता) पर बहस है। रणबीर कपूर के खानपान से चाल-चलन तक के पुराने किस्से मर्यादा पुरुषोत्तम राम की भूमिका में बर्दा

करीब हजार का हॉल...पचास भी हाजिर नहीं!

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करीब हजार का हॉल...पचास भी हाजिर नहीं!

ठीक है, साहित्य का समारोह है तो कविता -कहानी-उपन्यास पर ही बात होंगी लेकिन साहित्य समाज का दर्पण हैं और अगर कलम मौजूदा हालत पर नहीं चल रही तो समझ लो धार भोथरी हो गई है। वाणी प्रकाशन के साहित्य उत्सव में पहले दिन यही लगा...! एक भी ऐसी बात सुनने को नहीं मिली जिसमें मौजूदा दर्द हो, दर्द सहने वाला हो, दर्द न ही सही, दर्द देने वाला तो हो, वो भी नहीं था. जैसे लिखने वालों को कोई सरोकार ही नहीं हैं, रामधारी सिंह दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ में लिखा था ‘जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।’ बहरहाल, अदिति माहेश्वरी और सत्य व्यास की बातचीत से लेखन में करियर बनाने वालों की तकलीफ आई। कह रहे थे लेखन में करियर बनाना मुश्किल हैं, हमारे बोकारो में आई आईटी का माहौल है, हर कोई 12वीं बाद उसी की तैयारी करता हैं... जब मेरी पहली किताब मशहूर हुई और उसके बारे में इंडिया टुडे में छपा तो पिताजी का फ़ोन आया। पूछा- क्या छपा है तुम्हारे बारे में, मैंने कहा - पत्रकार कुछ भी लिख देते हैं। सत्य आगे कहते हैं ये हालात तब थे, जबकि घर पर पढ़ने-पढ़ाने का माहौल था। 35 साल की उम्र में मेरी पहली किताब आई और 16- 17साल की उम्र से में पढ़ रहा हूं। फिल्मों में लिखते हैं, कहते हैं ‘फ़िल्मी दुनिया लेखकों को इंतज़ार नहीं करवाती, उन्हें सम्मान देती हैं, बस आपकी कहानी में नाटकीय बदलाव कर देते हैं, किताब में कहानी आपकी मर्जी से बदलती

डेढ़ अक्ल... नमूना!

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डेढ़ अक्ल... नमूना!

रामहित यादव को (अंग्रेजी में राम-हिट) ‘राम ने यादव को मारा’ कर देने पर चुनाव आयोग के खिलाफ खूब हंसी जाहिर की गई। आप के नेता संजयसिंह ने कहा कि राम ने यादव को ही क्यों मारा... शर्मा, वर्मा, ठाकुर, राजपूत, जैन को क्यों नहीं मारा... क्या आज लोगों का कम्प्यूटर भी जातिवादी हो गया है। अभी इस पर हंगामा हो ही रहा था कि दूसरा मामला और आ गया कि रवि शर्मा के पिता रामहित शर्मा का नाम ‘राम ने शर्मा को मारा’ कर दिया तो उत्तरप्रदेश के चुनाव आयुक्त बल्लियों उछल पड़े कि यादव को ही नहीं, राम ने अब शर्मा को भी मार दिया है। अति-उत्साह में नवदीप रिनवा ने एक्स पर पोस्ट डाल दी और अपनी कॉलर ऊंची करने लगे! इस पर भी जब आलोचना होने लगी कि सवाल यादव या शर्मा को मारने का नहीं है, नाम में ऐसी गलती कैसे हो जाती है, जबकि यह काम मशीन नहीं, बीएलओ यानी चुनाव में लगे कर्मचारी करते हैं। यदि ये कर्मचारी इसी देश के हैं, तंजानिया या चीन से नहीं आए हैं तो उन्हें नाम का मतलब नहीं पता है। अनुवाद करने के लिए किसने कहा उनसे। नवदीप रिनवा ने ‘राम ने शर्मा को मारा’ बताते हुए यह भी लिख दिया कि ‘हम खुशकिस्मत हैं कि शर्मा को मारा है’ से यह साबित हो गया कि हमारे यहां जातिवाद नहीं है। शर्मनाक यह है कि बंदे ने उस गलती का जिक्र नहीं किया और माफी भी नहीं मांगी कि इस तरह की गलती सिर्फ लापरवाही का ही सबूत है। खुश हो रहे हैं कि शर्मा को भी

गालिब से अलग अंदाज में मिलना है तो...!

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गालिब से अलग अंदाज में मिलना है तो...!

ओमा द अक्, यह नाम जितना अलग है, वे खुद भी आम नहीं हैं। अध्यात्म पर तो बात करने वाले कई हैं, लेकिन उर्दू-अदब पर ओमा को सुनना अलग ही अनुभव है। यू-ट्यूब चैनल ‘ओमा द अक्’ के साझा आँकड़ों में 1 लाख 78 हजार सब्सक्राइबर और 948 वीडियो हैं। बनारस से शुरू बातचीत में फिर शहर लौट आता है। कभी घाट की गंभीरता के साथ तो कभी गलियों की रौनक लेकर। वहीं से धर्म, कविता और रोज की जिंदगी की बातें एक-दूसरे से जुड़ती चली जाती हैं। इंदौर में 30 अक्टूबर की शाम 5 बजे, रवीन्द्र नाट्यगृह में वाणी साहित्य उत्सव के दौरान कृतिका देसाई ‘बुद्ध: आध्यात्मिक घटना या दुर्घटना? विषय पर बात करेंगी। शाम छह बजे मुशायरे में भी शामिल रहेंगे! ओमा उपाध्याय का जन्म बनारस में पंडित हरिहर नाथ शास्त्री और मां का नाम विद्यावती देवी के यहां हुआ। इन्हीं ओमा उपाध्याय की पहचान ‘ओमा द अक्’ के नाम से बनी। कोई अध्यात्म वक्ता तो कोई कवि और लेखक के तौर पर जानता, मानता है। ज्योतिष, फिल्में और फोटोग्राफी भी उनका हिस्सा है, लेकिन इन सबके पीछे दिखाई देता है, बनारस। वहीं बचपन बीता और उसी का असर सोच से बातचीत में नजर आता है। धर्म की किताबें पढ़ने और ध्यान का सिलसिला कम उम्र में शुरू हुआ और बोलने तक पहुंचा। 16 साल की उम्र में प्रवचन शुरू किया। शुरुआती बातचीत धर्म पर थी। फिर इंसान की जिंदगी, परेशानियां, समाज और साहित्य भी शामिल हो गए। बात कई रास्तों

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खरीदी घोटाले का असर है कि अब अधिकार जाता रहेगा। जो सामान चाहिए… भोपाल खरीदेगा! मुख्यमंत्री ने जो कहा उसका सार यही है कि इनके भरोसे नहीं रह सकते। चार आने की चीज चार सौ रुपये में खरीदने का हल्ला पूरे देश में है। सोशल मीडिया के सारे प्लेटफार्म इससे भरे पड़े हैं। भ्रष्टाचार का देश में ताजा प्रतीक हो गए इस मामले ने मध्यप्रदेश की जमकर भद पिटा दी है। अब यह शंका भी मजबूत हो रही कि सरकार प्रदेशभर की खरीदी खुद करना चाहती थी… इस कारण उसने अपने ही बड़े अफसर से भंडाफोड़ कराया कि हमारी मजबूरी हो गई भोपाल से ही खरीदी करना। अब जो ‘प्रसाद’ हर जगह बंटता था, वह एक जगह अर्पण हो जाएगा। भोपाल में भी पहले इकट्ठा खरीद होती थी, कांग्रेस के जमाने में, तब के किस्से अब तक हवा में हैं।

प्यार बनाए रखने का नुस्खा…

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प्यार बनाए रखने का नुस्खा…

भाग्यश्री ने काम और घर की भागदौड़ में समय नहीं निकालने वाले जोड़ों को तरीका सुझाया है। उन्होंने इसे ‘2-2-2’ नाम दिया है। इसमें हर दो हफ्ते में साथ बैठना, साथी की दो अच्छी बातें कहना और दो मिनट बिना बोले एक-दूसरे की आंखों में देखना शामिल है। उनका कहना है कि साथ कॉफी पीने या खाना खाने जाएं तो फोन अलग रख दें। उस समय न ऑफिस की बात हो न घर या काम, बस एक-दूसरे को सुनें। काउंसलर चेतना.एम के मुताबिक यह करीब आने का तरीका हो सकता है, मगर हर रिश्ते पर लागू होने वाला वैज्ञानिक फॉर्मूला नहीं है। बाहर जाना मुमकिन न हो तो घर पर साथ खाना या थोड़ी देर टहलना भी मौका दे सकता है। जरूरी है कि दोनों को लगे कि उनकी बात सुनी और समझी जा रही है।

नरोत्तम तो नकार दिए गए!

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नरोत्तम तो नकार दिए गए!

दतिया में भाजपा की हार के साथ ही नरोत्तम मिश्रा की सियासत पूरी हो गई थी। आखिरी कील कोर कमेटी को लेकर थी कि वहां नाम था। हालांकि, शिकस्त के बाद जो मीटिंग हुई थी, उसमें उन्हें बुलाया नहीं गया था और अब तो कमेटी से रवाना ही कर दिया गया है। नए जो नाम आए हैं, उनमें पुराने गृहमंत्री नहीं हैं। यानी भोपाल आने का बहाना खत्म हो गया है और भाजपा की पहली कतार वाली सियासत में नरोत्तम के लिए जगह नहीं है। नए प्रभारी के साथ जो नई लिस्ट जारी हुई है, उसमें सब हैं, बस इनको ही रवाना किया गया है। वैसे मिश्रा के घर हेमंत खंडेलवाल पहुंच गए थे, जिनका जोर-जोर से स्वागत हुआ है, पर जगह तो चली ही गई है। नरोत्तम को जिस तरह लगातार पीछे धकेला जा रहा है और कहीं से मदद नहीं मिल रही है, उससे इतना समझ आ गया कि अमित शाह से मजबूत रिश्तों का जो गुब्बारा बना हुआ था, उसकी हवा निकल गई है। गृहमंत्री जिसे पसंद करते हों, उसे कोई कैसे कमजोर कर सकता है, लेकिन नरोत्तम का टिकट काटा गया। साथियों को बेदखल किया और अब उनके लिए रास्ते तंग कर दिए गए हैं। अभी जो माहौल है, उसे देखकर लगता है कि अगले चुनाव में भी उनके लिए कुछ बन नहीं रहा है। वैसे अगर दतिया को हजम कर जाते और टिकट कटने पर खामोश रह जाते, तो राज्यसभा के दावेदार हो सकते थे, लेकिन जिस तरह फजीहत हुई है, उससे लगता है कि वहां भी दाल नहीं गलने वाली थी। जो भी हो, लेकिन भाजपा का मजबूत

लाख में इंदौर से कितने!

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लाख में इंदौर से कितने!

एक नवंबर को एक लाख दिल्ली ले जाने का दावा प्रदेश कांग्रेस कर रही है। सोशल मीडिया पर भी हर नेता ‘चलो दिल्ली’ का नारा लगा रहा है। हर तरफ मीटिंग हो रही हैं और आज इंदौर में जीतू पटवारी की मौजूदगी में सभी कांग्रेसियों को बुला लिया गया है कि दिल्ली चलना है। अब देखना है कि प्रदेश के एक लाख में इंदौर से कितने कांग्रेसी रहते हैं। वैसे पिछली बार ज्यादा गए नहीं थे और इस बार भी त्योहारों के नाम पर सभी इधर-उधर भाग रहे हैं। लेकिन उषा नायडू ने जकड़ लिया है और बार-बार कह रही हैं कि कम से कम हजार को तो दिल्ली जाना ही चाहिए। शहर अध्यक्ष और बाकी नेताओं को इसके लिए घेर रही हैं कि प्रदेश अध्यक्ष का शहर है, तो इतने बनते हैं। लेकिन लगता नहीं है कि ऐसा कुछ हो पाएगा, क्योंकि इंडिया ब्लॉक का मामला है, सीधे कांग्रेस नहीं है। फिर संविधान दिवस पर बड़ा हंगामा करना है। इसलिए अभी पूरी ताकत नहीं है। जो भी हो, पर इंदौर के आंकड़े पर सबकी नजर है कि आखिर लाख में कितने!

छब्बीस तो पूरा हो गया!

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छब्बीस तो पूरा हो गया!

कुर्सी की तलाश में घूम रहे इंदौर के भाजपा नेताओं ने मान लिया है कि छब्बीस में तो भला नहीं होगा और सत्ताईस में कब होगा, कोई गारंटी नहीं है। भोपाल की मीटिंग में निगम-मंडल के साथ दूसरे मामलों को लेकर बात तो हुई है, लेकिन मुख्यमंत्री ने कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई है। पहले कैबिनेट फैलाव का जिक्र हो गया, जिससे निगम-मंडल तो जाते रहे हैं। छब्बीस में कैबिनेट हेरफेर हो, इस पर भी अगर-मगर ही है। यानी साल खत्म होने में जितने दिन बाकी हैं, उनमें इंदौर वालों का भला होता दिख नहीं रहा है। पहले दिवाली के बाद खुशियां देने की बात हुई थी और अब साल बदलने के बाद कुछ करने का जिक्र है। वैसे इंदौरी नेता फिसड्डी ही रहे हैं कि निगम-मंडल में जगह नहीं मिली है। आईडीए बन नहीं रहा है, एल्डरमैन पर कोई बात नहीं करता है और बाकी जो कुर्सियां हैं, वो भी तंग कर दी गई हैं। अब नए साल का लड्डू उछाल दिया गया है और नेताओं ने फिर मुंह खोल दिया है!

खेल दिलचस्प... मगर पकड़ कमजोर!

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खेल दिलचस्प... मगर पकड़ कमजोर!

फोन अगर दस साल पीछे बैठे आदमी से बात करा दे तो पहले हैरानी होगी और फिर डर लगेगा। जब वह आदमी बीते समय में कुछ बदलकर आज की जिंदगी अपने हिसाब से चलाने लगे। ‘तू है मेरी किरण’ इसी दिलचस्प खयाल पर बनी है। यहाँ खतरा सिर्फ जिद्दी आशिक से नहीं है बल्कि उस ताकत से है जिसके सहारे वह किसी की मर्जी और जिंदगी पर कब्जा करना चाहता है। कहानी में रोमांस से ज्यादा रहस्य और बेचैनी की गुंजाइश है। सोनाक्षी सिन्हा का किरदार किरण लेखक है। पहली किताब सफल रही थी लेकिन दूसरी आगे नहीं बढ़ रही। पति के साथ नए घर में आने पर उसे पुराना मोबाइल मिलता है। उससे समर से बात होती है जिसे जहीर इकबाल ने निभाया है। किरण 2026 में है और समर 2016 में। शुरुआत में यह बातचीत दोनों के लिए एक पहेली है, लेकिन धीरे-धीरे समर की दिलचस्पी ऐसी जिद बन जाती है जिससे किरण की जिंदगी खतरे में पड़ने लगती है। उसे समझना है कि उसके साथ हो क्या रहा है और वह इससे निकले कैसे। फिल्म ‘डर’ याद आती है लेकिन करण रावल ने यहाँ दीवानगी के साथ समय का खेल जोड़ दिया है। किसी का पीछा करने वाला आदमी अगर उसके बीते समय तक पहुँच रखता हो तो उससे बचना कितना मुश्किल होगा, यही सवाल कहानी को ताकत देता है। समर की पकड़ से निकलने की कोशिश में अच्छे सस्पेंस की गुंजाइश बनती है। फिल्म मुश्किल जगह पर भी पहुँचती है जब उसके गलत बतावव्यवहार के पीछे की तकलीफ दिखाकर उसके लिए हमदर्

कालिख पर लीपा-पोती है!

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कालिख पर लीपा-पोती है!

भोपाल में चंद्रशेखर तिवारी के साथ जो हुआ है, उसके बाद विरोध के तरीके पर बहस शुरू हो गई है। कालिख पोतने को गलत बताने वाले कह रहे हैं कि अगर किसी समाज का स्वाभिमान आहत हुआ है, तो सवाल पूछिए, विरोध कीजिए, तर्क कीजिए, लेकिन याद रखिए, किसी चेहरे पर कालिख पोत देने से अपने विचारों का चेहरा उजला नहीं हो जाता है। कानून के दायरे में रहकर जवाब मांगा जाना चाहिए। सहमति और असहमति तो होती है, पर इस तरह की हरकत ठीक नहीं है। इसके अलावा बहुत कुछ कहा जा रहा है। बात ठीक है और ऐसा नहीं होना चाहिए, लेकिन चंद्रशेखर तिवारी ने क्या कभी विरोध या असहमति पर इस तरह का कोई रास्ता अपनाया है? किसी के पास कोई ऐसी मिसाल है? जो विचारों की आजादी की बात कर रहे हैं, क्या उन्होंने कभी तिवारी के विचारों को टटोला है, समझा है, देखा है, सुना है? अब चूंकि पंगा दलित बिरादरी से हो गया है, इसलिए माफी मांग रहे हैं। बावजूद इसके, कालिख तो पोत ही दी गई है। वैसे सोशल मीडिया पर हंगामा है और तिवारी का साथ देने के लिए कई सामने आ रहे हैं। उधर भी इसी तरह का मामला है। यानी तिवारी का निशाना तो कहीं और होता था, पर कालिख कहीं और से आ गई है!

रितेश कटकानी ट्रस्टी

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रितेश कटकानी ट्रस्टी

श्री वर्धमान स्थानकवासी महासंघ ट्रस्ट, स्कीम नंबर 71 में समाजसेवी रितेश कटकानी को ट्रस्टी बनाया गया।रमणीक कुंवरजी महाराज की महामांगलिक के बाद सभा में यह नियुक्ति की गई।

संदेह दूर करने की कोशिश...!

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संदेह दूर करने की कोशिश...!

महिलाएं बखूबी काम कर रही हैं, लेकिन संदेह दूर ही नहीं होते। शानदार कहानी, चौंकाने वाली सिनेमैटोग्राफी और दमदार अभिनय के साथ सीरीज़ "मैडम इंस्पेक्टर’ का अंत भी अलग मोड़ पर होता है। दो व्यक्तियों के जीवन में एक जैसी घटना हो सकती है, लेकिन एक ही घटना के अलग-अलग मतलब किसी व्यक्ति के मन, व्यक्तित्व, करियर पर किस तरह असर करते हैं, सीरीज़ विचार देती है। इंस्पेक्टर चित्रा की माँ उसे और उसकी बहन को बचपन में ही छोड़कर चली गई थी। उस समय दोनों बहनें स्कूल में पढ़ती थीं। पिता ने उन्हें समझाया कि उनकी माँ का कोई दोष नहीं था, बल्कि वे ही अपनी माँ के काबिल नहीं थे। यह बात दोनों लड़कियों को काबिल बनाने की दिशा में ले जाती है। कातिल की माँ भी उसे और उसके भाई को बचपन में छोड़कर चली गई थी। उसके पिता ने बच्चों को बताया कि उनकी माँ बुरी थी। हताश पिता ने बच्चों के साथ आत्महत्या करने की कोशिश की। इस घटना में पिता और भाई की मृत्यु हो गई, लेकिन कातिल बच गया। उसे कभी सच्चाई पता ही नहीं चली कि पिता उसकी माँ को पता था। वह जीवन भर माँ से नफरत करता रहा और धीरे-धीरे उन सभी महिलाओं से भी नफरत करने लगा, जो दूसरा विवाह करना चाहती थीं। इसी नफरत ने उसे सीरियल किलर बना दिया। सीरीज़ की खूबी यह है कि वह अपराध के पीछे के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करती है। किसी स्त्री का विवाह टूट जाने का मतलब यह नहीं कि उसके जीवन की सं

मुशायरे में आंसू और रूमाल भी…!

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मुशायरे में आंसू और रूमाल भी…!

इमरान प्रतापगढ़ी की नज्म ‘वालिद-ए-मोहतरम’ और उसे सुनते भावुक शायरा हिमांशी बाबरा की चर्चा है। कलाम सुनकर आँख भर आना बिल्कुल आम है मगर जब चर्चा नज्म से ज्यादा सुनने वाले के आँसुओं की होने लगे तो देखना चाहिए कि महफिल में शायरी कहाँ है और कैमरा किस तरफ घूम गया। पिता पर लिखी नज्म सुनकर किसी को भी पिता याद आएगा ही। इमरान की नज्म सुनकर हिमांशी बाबरा भावुक हुईं तो उनके जज्तबा पर फैसला सुनाने वाले हम कौन। शायर ने पूरी नज्म पढ़ी हो और सुनने वाले ने पूरे दिल से सुनी हो फिर भी मोबाइल पर पहुँचने के बाद दोनों के हिस्से बदल सकते हैं। नज्म की दो पंक्तियाँ और रोते हुए चेहरे की चार तस्वीरें। ऊपर मोटे अक्षरों में लिख दीजिए, ‘खुद को रोने से नहीं रोक पाईं।’ अब बताइए नज्म सुनने आएगा या यह देखने कि कौन कितना रोया। पहले मुशायरे से लौटकर पूछा जाता था कि किसने अच्छा पढ़ा। अब पूछने को यह भी है कि किसने किसे रुलाया। इस हिसाब से बेचारे उस शायर का क्या होगा जो रात भर अच्छी गज़ल पढ़ता रहा मगर किसी की आँख से एक बूँद नहीं निकलवा सका। क्या अगली बार आयोजक उससे कहेगा कि जनाब आपके शेर तो ठीक थे मगर हमारे कैमरे वाले को कुछ मिला नहीं। सबसे ज्यादा मुश्किल उस सुनने वाले की है जो चुपचाप महसूस करता है। बगल में बैठे साहब ने रूमाल निकाला और महफिल उनके नाम हो गई। खामोशी से शायरी सुनना भी घाटे का सौदा लगे तो हैरत कैसी! जरा उस

गुदड़ी में लाल नहीं, लाली भी...!

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गुदड़ी में लाल नहीं, लाली भी...!

मलीषा खारवा को मॉडलिंग का बड़ा काम मिला तो सबसे बड़ी खुशी यह थी कि अब पापा को बच्चों का पेट भरने के लिए अपना खाना नहीं छोड़ना पड़ेगा। कैमरे के सामने खड़ी एक लड़की की मुस्कान के पीछे इतना दर्द क्या है? दुनिया उसकी खूबसूरती देख रही थी और वह अपने घर की भूख कम होने पर खुशी महसूस हो रही थी। मुंबई के बांद्रा में समुद्र किनारे झुग्गी में मलीषा का बचपन बीता। पिता और भाई के साथ ऐसा ठिकाना था जिसे बार-बार बनाना पड़ता था। लकड़ियों के सहारे घर खड़ा होता और ऊपर कुछ डालकर धूप से बचने का इंतजाम किया जाता। नगर निगम की कार्रवाई में वह टूट जाता तो परिवार फिर उसे जोड़ने लगता। बिजली और पानी भी आसानी से पूरा नहीं मिलता। इन्हीं हालात में मलीषा मॉडल और डांसर बनने का सपना देखती थीं। बच्चों के कार्यक्रमों में जोकर बनकर पिता परिवार चलाते थे। दूसरों के बच्चों को हँसाने से मिलने वाले पैसों से अपने बच्चों की जरूरतें पूरी करते थे। कमाई इतनी नहीं थी कि हर जरूरत आसानी से पूरी हो जाए। बेटी के सपने सिर्फ इसलिए छोटे नहीं हुए कि घर छोटा था। अमेरिकी अभिनेता और डांसर रॉबर्ट हॉफमैन से मुलाकात ने मलीषा के लिए रास्ता खोला। उनका वीडियो बना और सोशल मीडिया पर पहुँचा। लोगों ने उस चेहरे को पहचाना जिसमें यकीन और खुली मुस्कान थी। धीरे-धीरे मॉडलिंग के काम मिलने लगे। बड़े ब्रांड फॉरेस्ट एसेंशियल्स ने उन्हें अपने ‘युवती’ अभियान का

जीतू ने बोला तो जागे!

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जीतू ने बोला तो जागे!

कुणाल सोलंकी पर हुई एफआईआर के बाद कांग्रेस ने तो सुस्ती पकड़ रखी थी, लेकिन जीतू पटवारी की फटकार के बाद जागे हैं। अफसरों से मुलाकात की है, रिपोर्ट का विरोध किया है और कुणाल के साथ खड़े होने का दिखावा ताकत से हो गया है, जबकि पहले भी सब कुछ किया जा सकता था, लेकिन नहीं किया गया। वैसे काम तो नेता प्रतिपक्ष का है कि अपने पार्षद के लिए लड़ें, लेकिन जब से सोनिला मिमरोट को बनाया गया है, उनसे कुछ हो ही नहीं रहा है। हालांकि, कुणाल ने जब सड़क पकड़ी है, मिमरोट साथ दिखाई दी हैं, लेकिन जब बात लड़ने की आती है, तो कांग्रेसी हमेशा बाद में लकीर पीटते दिखाई देते हैं। मौके पर कुछ कर नहीं पाते हैं। फिर सारे पार्षद भी नहीं थे, क्योंकि बुलाया ही नहीं गया, जबकि मामला पार्षद का ही था। पटवारी के कहने पर चिंटू ने अफसरों से बात कर ली है, कुछ गरमी भी दिखाई है, लेकिन रिपोर्ट तो वापस होगी, लगता नहीं है। वैसे कुणाल में तमाशा करने का पूरा हुनर है और रिपोर्ट को भुनाने निकल पड़े हैं। इलाके में चीख-पुकार कर रहे हैं कि लोगों की लड़ाई के लिए मुझ पर मुकदमा लगा है। अब इसका कितना फायदा मिलेगा, आगे पता चलेगा। पर कांग्रेस जागी तो पटवारी के कहने पर ही है, क्योंकि कुणाल उनके पार्षद हैं और करीब भी हैं!

विधायक ही सर्वोपरि हैं!

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विधायक ही सर्वोपरि हैं!

सत्ता से अलग संगठन चलाने की बात भाजपा अक्सर करती है, लेकिन इससे निकल नहीं पाती है। अभी जिनको वार्ड अध्यक्ष या दूसरी जिम्मेदारी दी गई है, सबमें विधायकों का दखल है। उनकी मर्जी से ही बनाया गया है और कहीं कोई चुनौती नहीं दे पाया है। यानी इंदौर की भाजपा चल तो विधायकों के हिसाब से ही रही है। इंदौर विकास प्राधिकरण में किसको बनाना है, नाम विधायकों से लिए जा रहे हैं। एल्डरमैन के लिए उनसे ही बात हुई है और अब वार्ड अध्यक्ष उनकी मर्जी से बने हैं। कहने को संगठन सर्वोपरि है, पर विधायक ही ताकतवर हैं। उनके बगैर कुछ होता नहीं है। शहर भाजपा की जो टीम बनती है, उसमें विधायकों का दखल रहता है। पार्षदों को टिकट विधायकों के हिसाब से मिलेंगे। यानी मान लिया जाए कि विधायक का हर तरफ पैर फंसा है। मधु वर्मा से लेकर गोलू शुक्ला तक किसी ने दूसरे को जगह नहीं दी है, जबकि जीतू जिराती लगातार राऊ में कोशिश कर रहे हैं, पर संगठन में अपनों को जगह तो नहीं दिला पाए हैं। गोलू ने पुराने सारे वार्ड अध्यक्षों को बदल दिया है, क्योंकि आकाश विजयवर्गीय के बनाए हुए थे। एक नंबर में आकाश ने अपनी मर्जी से सबको बना लिया है। यानी जो जहां ताकत में आया है, उसने अपनी चला ली है। वैसे तीन नंबर में अभी तो वार्ड अध्यक्ष बदले गए हैं। बारी पार्षदों की है और देखना रहेगा कि कितने बदलते हैं। पर इतना तय है कि संगठन का कितना ही ढोल बजाया जाए, लेकिन व

उत्तर प्रदेश में अखिलेश की रहेगी मदद!

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उत्तर प्रदेश में अखिलेश की रहेगी मदद!

दिग्विजय सिंह की यात्रा को मध्यप्रदेश में अच्छा साथ मिल रहा है, पर लगाम पत्नी अमृता के हाथ में है। जीतू पटवारी के जाने से कांग्रेसियों को रास्ता मिल गया है। उत्तर प्रदेश पर बातें होती रही हैं और अब कांग्रेसी ही कह रहे हैं कि अखिलेश का साथ मिलने वाला है, क्योंकि मुद्दा तो उत्तर प्रदेश चुनाव से जुड़ा है। दिग्विजय ने जिस तरह से शुरुआती माहौल बनाया है, उसका फायदा होगा। इसलिए अखिलेश से बात हो गई है और वहां उनकी टीम मदद करेगी। कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी से दिग्विजय के रिश्ते हैं, जिनकी लड़की आराधना मिश्रा अभी उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष हैं। यहां पटवारी ने शुरुआत कर दी थी और वहां आराधना साथ हो जाएंगी। कांग्रेस से जो मदद दिग्विजय को चाहिए, मिल जाएगी। हालांकि दिल्ली का कोई बड़ा नेता आएगा, ऐसा लगता नहीं है, पर अखिलेश से मामला बैठ गया है और अयोध्या तक समाजवादी पार्टी इतना तो कर ही देगी कि दिग्विजय को भरपूर जगह मिल जाए। यानी जिस तरह यात्रा शुरू हुई है, वैसी ही पूरी होती दिख रही है और इस बार सुर्खियां अमृता राय के हिस्से सबसे ज्यादा हैं!

तमाम शहर के रस्ते सजा दिए जाएं…!

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तमाम शहर के रस्ते सजा दिए जाएं…!

कल सुबह उस सड़क पर घूमने वाले हैरान थे कि कहीं रातोंरात निजाम तो नहीं बदल गया, कॉक्रोच पार्टी का ‘सत्ता से हटाओ’ नारा कहीं सफल तो नहीं हो गया! यह तो वैसा ही चमत्कार था कि सुदामा जब कृष्ण से भेंट कर लौटे तो देखा, उनकी झोपड़ी गायब थी और वहां महल खड़ा था। इस तरह के तमाम अजूबे इस रातोंरात के बदलाव में शामिल कर सकते हैं। यह सड़क बरसों से स्थित-प्रज्ञ है, इसे कुछ नहीं व्यापता! सरकार आती और जाती रही, मगर इसकी हालत भी देश के किसान-मजदूर जैसी ही रही, कोई बदलाव नहीं हुआ। यहां घूमने वाले झुण्ड में भी चल रहे हों तो, उन्हें सारे गड्ढे अंखस्थ हैं कि कितनी भी गंभीर बहस हो रही हो, गड्ढे फलांगना या बच कर निकल जाना नहीं भूलते। कुछ तो इतने वरिष्ठ हो चुके हैं कि आंख बंद कर बता देते हैं कि अब कौन-सा गड्ढा या रबर का खंडित स्पीड-ब्रेकर आने वाला है। कभी यदि स्कूटर या फटफटी से गुजरना हो तो पीछे बैठा, बातें करते-करते यह बताता चलता है कि अब दाएं ले ले, आगे बड़ा गड्ढा है या अब बाएं ले ले, आगे सड़क उखड़ी है। यहां तक कि कभी रात में भी गुजरना हो और बत्ती गुल रहती ही है तो ये अंधेरे में भी उधड़ी सडक, खुले चेम्बर या स्पीड ब्रेकर का अंदाज लगा लेते हैं! ऐसा नहीं है कि इस बारे में शिकायत नहीं हुई। यहां विधायक जैसे रोज ही आते हैं घूमने, पर अब उनकी चलती नहीं। पार्षद कभी मिलते नहीं और मिल जाएं, तो शिकायत का असर नहीं। कु

नाराज अमिताभ ने तस्वीरें लीं...!

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नाराज अमिताभ ने तस्वीरें लीं...!

गायक सुखविंदर इंदौर आए थे। उन्हें उज्जैन जाना था। उनका कॉल आया कि इधर आ रहा हूं तो मीडिया से बात कर लेता हूं। सयाजी होटल में मीडिया को बुलाया। सुखविंदर ने जवाब देने के बजाये गाना शुरू कर दिया और एक घंटे गाते रहे। क्या ही मंजर था ! सवाल लेकर आए थे, थिरक रहे थे। पहली बार किसी कलाकार ने मीडिया को इस तरह एंटरटेन किया था। उनका तरीका कामयाब रहा। फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ की स्टार कास्ट आमिर खान, माधवन और शरमन जोशी का मीडिया ने ढाई घंटे इंतजार किया। ऐसा इंदौर में पहली बार हुआ। असल में विधु विनोद चोपड़ा और चेतन भगत के बीच राइटिंग का मामला गरमा गया था। भगत ने कह दिया था कि ठीक से नाम श्रेय नहीं दिया। जवाब में बताया कि उन्होंने तकरीबन 9.9 लाख रुपये में अधिकार बेच दिए थे। प्रेस कॉन्फ्रेंस में विधु विनोद चोपड़ा पत्रकार पर भड़क गए, जिसके बाद उन्हें माफी मांगनी पड़ी। आमिर खान और चेतन भगत के बीच भी तीखी बयानबाजी हुई थी। विधु विनोद चोपड़ा आने वाले थे, लेकिन आखिरी मौके पर नहीं आए। आमिर खान का इंतजार कर रहे थे। देरी से आए और सबसे पहले माफी मांगी कि आपको इंतजार करना पड़ा। माहौल थोड़ा ठंडा हुआ। फिर बोले कि सौ सवाल पूछोगे तो सौ जवाब देंगे। मुंबई और दिल्ली में जो बातें बनी थीं, उन्हें इंदौर से हवा मिल सकती थी, लेकिन आमिर खान ने जिस तरह जवाब दिए और पूरे मामले को सुलझाया, उससे हुआ यूं कि किसी को कोई मसाला नहीं