संदेह होता रहता है ‘शक...’ पर!

· Indore

संदेह होता रहता है ‘शक...’ पर!

हमारे यहां दिक्कत यही है कि वेब सीरीज बनाने से पहले ही उसकी लम्बाई तय कर लेते हैं कि कम से कम सात एपिसोड तो ‘होनाइच’। जब कफन के हिसाब से मुर्दा तलाशेंगे तो कभी नाप का नहीं मिलेगा ‘शक...’ में शुरुआत तो नई लगती है, लेकिन फिर खाली स्थान पर इस कदर भरती की जाती है कि कोफ़्त होने लगती है। कई बार तो बंद करने का मन हो आता है ।

शिमला में पूरी शूटिंग है ,लेकिन कुछ नया नजर नहीं आता। अस्पताल से नवजात बच्ची चोरी होती है और फिर माँ निकलती है उसे तलाशने। हर एक को शक के घेरे में लिया जाता है, तभी समझ आ जाता है कि मामला तो कुछ और ही है ।लापरवाही इस कदर कि जिस बच्चे का अपहरण होता है ,उसके बाल ही थोड़े कम कर दिए होते तो नवजात लगता। साल डेढ़ साल से कम का तो लगता ही नहीं है।

सोनी राजदान हो या सुमित व्यास या ताहिर राज भसीन, किसी किरदार को ना ढंग से लिखा गया और ना ही उन्हें मौका ही मिला। सारा दारोमदार परिणति चोपड़ा, जेनिफर विंगेट और अनूप सोनी पर कायम रहा। इनमें भी सबसे कमजोर परिणति ही रही। एक जैसे हावभाव और दुखी कम, बीमार ज्यादा नजर आती रही। जेनिफर हर तरह से उन पर भारी रही है, खूबसूरती में भी ।

सात एपिसोड के हिसाब से कलाकार तो ढेर सारे जमा कर लिए, लेकिन उन पर जरा काम नहीं हुआ। बीच में जादू टोना और जन्तर मंतर। रही सही कसर पुलिस अधिकारी अनूप सोनी को टैरो कार्ड का ज्ञाता बता दिया,जो अपनी प्रतिभा दिखाने में संकोच भी नहीं करते हैं। उन्हें कैंसर बता कर आखिर में मार देने का भी कोई मतलब समझ नहीं आता। अनूप सोनी को बढिया रोल मिला, लेकिन हंसी आती है कि हर समय एक ही हवलदार उनके साथ रहता है ।ऐसा कौन सा थाना है इस देश में कि कोई अधिकारी दस साल तक एक ही जगह जमा रहे ।

आखिरी एपिसोड में सारी गुत्थी यूँ सुलझ जाती है कि समय गुजारना मुश्किल। निर्देशक का असर कहीं नजर नहीं आता, शायद सेट पर ही पटकथा संवाद लिख रहे होंगे। संगीत भी ऐसा नहीं है,जो माहौल जमा सके। कुल मिला कर यह करीब चार घंटे से कुछ ज्यादा की है, लेकिन देखते हुए लगता है, जैसे पूरी रात गुजर गई। बोरियत ज्यादा है।