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संदेह होता रहता है ‘शक...’ पर!

संदेह होता रहता है ‘शक...’ पर!

हमारे यहां दिक्कत यही है कि वेब सीरीज बनाने से पहले ही उसकी लम्बाई तय कर लेते हैं कि कम से कम सात एपिसोड तो ‘होनाइच’। जब कफन के हिसाब से मुर्दा तलाशेंगे तो कभी नाप का नहीं मिलेगा ‘शक...’ में शुरुआत तो नई लगती है, लेकिन फिर खाली स्थान पर इस कदर भरती की जाती है कि कोफ़्त होने लगती है। कई बार तो बंद करने का मन हो आता है । शिमला में पूरी शूटिंग है ,लेकिन कुछ नया नजर नहीं आता। अस्पताल से नवजात बच्ची चोरी होती है और फिर माँ निकलती है उसे तलाशने। हर एक को शक के घेरे में लिया जाता है, तभी समझ आ जाता है कि मामला तो कुछ और ही है ।लापरवाही इस कदर कि जिस बच्चे का अपहरण होता है ,उसके बाल ही थोड़े कम कर दिए होते तो नवजात लगता। साल डेढ़ साल से कम का तो लगता ही नहीं है। सोनी राजदान हो या सुमित व्यास या ताहिर राज भसीन, किसी किरदार को ना ढंग से लिखा गया और ना ही उन्हें मौका ही मिला। सारा दारोमदार परिणति चोपड़ा, जेनिफर विंगेट और अनूप सोनी पर कायम रहा। इनमें भी सबसे कमजोर परिणति ही रही। एक जैसे हावभाव और दुखी कम, बीमार ज्यादा नजर आती रही। जेनिफर हर तरह से उन पर भारी रही है, खूबसूरती में भी । सात एपिसोड के हिसाब से कलाकार तो ढेर सारे जमा कर लिए, लेकिन उन पर जरा काम नहीं हुआ। बीच में जादू टोना और जन्तर मंतर। रही सही कसर पुलिस अधिकारी अनूप सोनी को टैरो कार्ड का ज्ञाता बता दिया,जो अपनी प्रतिभा दिखाने में

प्रमुख खबरें

इस हफ्ते.... मनोरंजन

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इस हफ्ते.... मनोरंजन

शक: ट्रस्ट नो वन (नेटफ्लिक्स | 24 सितंबर) नौ साल पहले खोई बच्ची को ढूंढती माँ, जहाँ हर मोड़ पर गहराता है झूट और फरेब का जाल। परिणति चोपड़ा, ताहिर राज भसीन और जेनिफर विंगेट हैं इसमें। दावा है, रोमांचक बनी है। हुंकार: द रोअर (जियो हॉटस्टार | 25 सितंबर) जुर्म, सत्ता और इंसाफ की जंग। फातिमा सना शेख, जीशान अय्यूब और अर्जुन माथुर की अपराध गाथा सिस्टम के सच को बेनकाब करने का दावा करती है। टॉक्सिक: अ फेयरीटेल फॉर ग्रोन-अप्स (ज़ी5 | 25 सितंबर) रॉकिंग स्टार यश का डबल रोल और गोवा के अंडरवर्ल्ड का खूनी दौर। हिंसा और धोखे के खेल में डॉन अपने ही साम्राज्य से टकराता है। डोंट बी शाय (प्राइम वीडियो | 25 सितंबर) ज़िंदगी की हर प्लानिंग तब धरी की धरी रह जाती है जब ‘पहला प्यार’ और दिल टूटने का चक्कर दस्तक देता है। 20 साल की ‘शाय’ की ज़िंदगी का यह खट्टा-मीठा, खुद से जोड़ने जैसा है। हल्का-फुल्का और ताज़ा मनोरंजन हो सकता है। हबीबी (सोनी लिव | 25 सितंबर) मोहब्बत जब रिवाजों और समाज से टकराती है, तो बगावत शुरू होती है। तमिलनाडु की ड्रामा फिल्म, परंपरा और प्यार के गहरे टकराव को दिखाती है। बकैती सीज़न 2 (ज़ी5 | 25 सितंबर) कटारिया परिवार की बेतुकी नोंकझोंक, देसी तंज और आम जीवन का महा-डोज़ लेकर आई है। ‘बकैती’! इस बार एक ही छत के नीचे कटारिया परिवार, जेब में पैसों की तंगी और रिश्तों में भरपूर खटपट—मगर जब मुश्किल

पापा यार - ज़ाकिर खान (नेटफ्लिक्स | 18 सितंबर)

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पापा यार - ज़ाकिर खान (नेटफ्लिक्स | 18 सितंबर)

‘सख्त लौंडा’ वाले ज़ाकिर खान पिता के साथ बदलते रिश्ते और मध्यम-वर्ग ज़िंदगी की खट्टी-मीठी सच्चाइयों को साझा कर रहे हैं।

लस्ट स्टोरीज़-3 (नेटफ्लिक्स | 18 सितंबर)

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लस्ट स्टोरीज़-3 (नेटफ्लिक्स | 18 सितंबर)

चार निर्देशक(विक्रमादित्य मोटवाने, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज) की नज़र से आधुनिक रिश्तों, दबी इच्छाओं और प्यार के अनकहे सच की कहानियां हैं।

'वेटिंग है‘(प्राइम वीडियो/एमएक्स प्लेयर | 16 सितंबर)

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'वेटिंग है‘(प्राइम वीडियो/एमएक्स प्लेयर | 16 सितंबर)

तत्काल खुलते ही सेकंड में टिकट गायब कैसे हो जाती हैं, यह व्यंग्यात्मक घोटाले की कहानी ईमानदार आरपीएफ सिपाही (दिव्येंदु) और रेलवे सिस्टम को हैक करने वाले शातिर (भुवन अरोड़ा) के बीच की दास्तान है!

ताजा खबरें

वाइब (सिनेमाघरों में | 18 सितंबर)

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वाइब (सिनेमाघरों में | 18 सितंबर)

‘मडगांव एक्सप्रेस’ के बाद कुणाल खेमू की इस फिल्म में दो निहायत कामचोर और बेपरवाह दोस्त अनजाने में बहुत बड़े आतंकी षड्यंत्र के बीच जा फंसते हैं।

‘फैमिली फुल हाउस’ (सोनी लिव | 19 सितंबर)

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‘फैमिली फुल हाउस’ (सोनी लिव | 19 सितंबर)

क्रिकेटर रोहित शर्मा अब ओटीटी स्क्रीन पर हैं! शो गपशप, दिलचस्प चुनौतियों और भावुक पलों का दावा करता है।

डोंट बी शाय | (ट्रेलर)

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डोंट बी शाय | (ट्रेलर)

आलिया भट्ट के प्रोडक्शन हाउस की यंग-एडल्ट रोमांटिक कॉमेडी! जिंदगी के हर फैसले की योजना वाली लड़की की दुनिया तब डांवाडोल हो जाती है, जब वह अमीर लड़के, संकोची बचपन के दोस्त और बिंदास नई सहेली के बीच फंस जाती है—कॉलेज लाइफ, दिल टूटने और खुद को तलाशने का सफर!

बेस्ट ऑफ द बेस्ट (नेटफ्लिक्स 18 सितंबर)

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बेस्ट ऑफ द बेस्ट (नेटफ्लिक्स 18 सितंबर)

हसन मिन्हाज और मैत्रेयी रामकृष्णन की यह जोश और जवानी से भरपूर अमेरिकी कॉलेज की उस दुनिया में ले जाती है जहाँ फ्यूज़न डांस की ट्रॉफी जीतने के लिए जान की बाज़ी लग जाती है; दोस्ती, सपनों और डांस का जश्न!

थुडक्कम (जियो हॉटस्टार| 18 सितंबर)

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थुडक्कम (जियो हॉटस्टार| 18 सितंबर)

मार्शल आर्ट्स में माहिर युवती जब दो बच्चियों के लिए आवाज उठाती है, तो निशाने पर आ जाती है। विस्मया मोहनलाल की पहली फिल्म रोमांच का दावा करती है।

नेहा कक्कड़ ने कहा- ‘अंगूर नहीं मिलते तो खट्टे लगते हैं’

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नेहा कक्कड़ ने कहा- ‘अंगूर नहीं मिलते तो खट्टे लगते हैं’

अंगूर ना मिले तो, अंगूर खट्टे हैं, लोग ऐसा बोलते हैं… अंगूर जिनको नहीं मिलते, उनको ही खट्टे लगते हैं। संगीत के रियलिटी-शो बिलकुल भी पहले से लिखे हुए नहीं होते हैं। चलिये, कलाकार भले ही लिखे के हिसाब से काम करते हों, लेकिन सामने बैठी जनता को तो नहीं सिखाया जा सकता ना… कि कब वाह करना है या कब खुश होना है। हम सभी आम परिवार से हैं, यदि किसी की दर्द भरी कहानी सुनते हैं, तो आंसू निकल ही आते हैं।

भाषा की सरलता और आक्रोश भी!

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भाषा की सरलता और आक्रोश भी!

किताब-उत्सव में या तो कलापिनी कोमकली को सुना गया या फिर जसिंता केरकट्टा को, एक में माधुर्य हैं, कोमलता हैं तो दूसरी में भाषा की सरलता और आक्रोश! जसिंता नदी के प्रवाह की तरह बोलती ही जाती हैं और सवालिए (अजय सोडानी) को मौका नहीं मिलता। एक ही सांस में दो-तीन सवाल पूछ डाले, जिसका एक-एक कर जवाब दिया। जसिंता (43) ने लम्बी यात्रा कर ली है, जिसमें झारखण्ड के जंगलों से यूरोप तक का सफर है, लेकिन थकान नहीं है, गुस्सा जरूर है, ये गुस्सा पिता के जातिगत अपमान का है, स्त्री होने के प्रतिबंधों का हैं और आदिवासियों को वनवासी कहे जाने या निचला समझे जाने का है। इसीलिए जब आदिवासियों को मुख्य धारा में लाने कि बात निकलती हैं तो वे “तथाकथित मुख्य धारा” कहती हैं। दरअसल जिसे भी मुख्यधारा का ‘ज्ञान’ देने का शोक हो उसे जसिंता से जरूर मिलना चाहिए या उन्हें जरूर सुनना चाहिए, जाले साफ हो जायेंगे! जसिंता कहती हैं कि खुद को आदिवासियों से श्रेष्ठ क्यों समझते हो? मुख्यधारा के नाम पर आदिवासियों से उनकी पहचान ली जा रही है। वनवासी और आदिवासी में अंतर है पर कहती हैं कि हम आदिवासी हैं, वनवासी नहीं। सदियों पहले हम अपनी संस्कृति अपने धर्म को लेकर जंगलों में चले गए, हम अपने इलाकों में घुसपैठिये पसंद नहीं करते, हमारा अपना धर्म हैं, हमारी अपनी पहचान हैं, जब अंग्रेज आये तो उन्होंनें उनसे संघर्ष किया। बिरसा मुंडा, अंग्रेज और ह

एक और गांधी…...

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एक और गांधी…...

‘फादर ऑफ द नेशन’ फिल्म में मनोज बाजपेयी बने हैं महात्मा गांधी! अनुभव सिन्हा निर्माता हैं और सुधीर मिश्रा का निर्देशन है। सुधीर मिश्रा ने बताया “आजादी के ठीक बाद के 21 दिनों की यह कहानी है, जब दिल्ली बन रही थी सत्ता का केन्द्र और गांधी ने दिल्ली छोड़ने का फैसला किया था। यह खुद को खोजने की यात्रा थी!”

सितार और गिटार से...‘ज़िटार’

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सितार और गिटार से...‘ज़िटार’

सितार और गिटार को मिलाकर भारतीय सितार वादक नीलाद्रि कुमार ने ‘ज़िटार’ बनाया था। उन्होंने रॉक गिटार को सितार से निकालने की चाह में सितार के तार बीस से पांच कर दिए। मूवी ‘बंटी और बबली’ के ‘चुप चुपके’, ‘ओंकारा’ का ‘नैना ठग लेंगे’, ‘दबंग-2’ के ‘तोरे नैना बड़े दगाबाज़ रे’ गीत में उन्होंने सितार का प्रयोग किया तो ‘गैंगस्टर’ मूवी के ‘ना जाने कोई’ में ‘ज़िटार’ का। उन्होंने ‘अ लाइफ़ इन ए मेट्रो’ के ‘अलविदा’ गीत में ‘धूम-2’ के ‘क्रेज़ी किया रे’ गीत में तथा ‘माज़ी’ के ‘मोरा जिया’ में भी ‘ज़िटार’ बजाया और अब ऋषभ शर्मा ने सितार को जेन ज़ी तक पहुँचाने के लिए नया लुक देकर चमका दिया है। ऋषभ की एलईडी रोशनी वाली सितार, डीजे की सोच ने उनके रियाज़ को रील्स में और शास्त्रीय संगीत के समारोहों को क्लासिकल म्यूज़िक के aनाम के साथ जोश से भरे स्टेडियम में बदल दिया है। सितार ने पाँच सदियों से 20 तार से जगह बनाई है। ऋषभ रिखिराम शर्मा के सितार में 640 एलईडी बल्ब लगे हैं और उनके शब्दों में यह लाइटसेबर जैसी दिखती है। कंसर्ट की शुरुआत में प्राणायाम करवाते हैं। तब उनके ऊपर डिजिटल लहरें और बादल चक्कर काटते दिखते हैं; उनके हीरे जड़ित दाँत रोशनी में चमकते हैं। सितार वादन को भव्य बना देते हैं और कहते हैं, सारा मज़ा सिर्फ़ रैपर्स ही क्यों लें! ऋषभ (27) ने भारत के 11 शहरों का दौरा किया, जिसके शो हाउसफ़ुल रहे और तीन पीढ़

नब्ज पर हाथ...

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नब्ज पर हाथ...

नब्ज पर हाथ...

धूमधाम से… कुत्ते-कुतिया का ब्याह!

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धूमधाम से… कुत्ते-कुतिया का ब्याह!

हद देखिए कि देश-दुनिया में नेपाल त्रासदी पर मातम है, सैकड़ों जान गईं, कई अब तक लापता हैं, वहीं इंदौर में पढ़े-लिखे बे-गैरत लोग सब कुछ दरकिनार कर जश्न मना रहे थे। जश्न भी कैसा, कुत्ते-कुतिया की शादी का! बीसीएम पैराडाइज (निपानिया-कोकिलाबेन अस्पताल के पास) में कल दोपहर ढोल-ढमाकों और डीजे का शोर था। अभी शादी-ब्याह का वक्त नहीं है, इसलिए यहां रहने वाले हैरान थे कि आखिर इतना हल्ला किस बात का। फिर पता चला ब्लॉक-इ के पांचवें माले पर रहने वाले अपने कुत्ता-कुत्ती का ब्याह करा रहे हैं और मेहमानों को बुलाया है। ढोलक की थाप पर डांस हो रहा है और डीजे भी कान फोड़ रहा है। हैरान करने वाली बात कि डीजे पर रोक है, फिर भी यहां बजा और खूब बजा, लेकिन इनकी बैंड बजाने के लिए न तो पुलिस आई और न अधिकारी। शाम तक मजमा रहा। खूब खाना-पीना भी हुआ। कुत्तों की शादी के पीछे आखिर क्या मकसद था, क्यों पैसा लुटाया जा रहा था, पता नहीं, लेकिन यहां रहने वालों का चैन इस हल्ले ने छीन लिया। सभी कान पर उंगुली धरे कोस रहे थे। इससे अधिक करते भी क्या। कुछ थे जो मजा ले रहे थे और कुछ थे, जो सजा झेल रहे थे।

राजा राम, तुम्हे मुख्यमंत्री बना दे - इमरती

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राजा राम, तुम्हे मुख्यमंत्री बना दे - इमरती

नईदुनिया बता रहा है कि भागीरथपुरा की पटेल किराना वाली गली के मुहाने पर पार्वतीबाई का मकान है। आठ महीने से बिस्तर पर हैं। सांस चल रही है, लेकिन आसपास की सुध नहीं है। नली से लिक्विड और दवाइयां दी जा रही हैं। गंदे पानी-कांड के बाद परिवार में इतनी दहशत है कि नर्मदा का पानी उबाल कर पी रहे हैं। तमाम दावों के बावजूद परिवार को ना मुआवजा मिला है, ना पार्वतीबाई का मुफ्त इलाज हो रहा है। परिवार वाले जैसे-तैसे इंतजाम कर सांस थामे हैं। दर्दनाक खबर है, जिसमें महापौर का बयान भी है कि काम पूरा हो चुका है। मामला अदालत में है, इसलिए ज्यादा कुछ नहीं बोल पाऊंगा। दैनिक भास्कर ने भी भागीरथपुरा को ऊपर वाले पन्ने की पहली खबर बनाया है और लिखा है कि गंदे पानी का पता था, फिर भी 92 से 100 दिन फाइल दबाए बैठे रहे अफसर। जांच आयोग की कोर्ट में पेश रिपोर्ट में खुलासा हुआ है। जिम्मेदारी तय करने के सवाल पर अफसर एक-दूसरे पर इलजाम धरते रहे हैं। रिपोर्ट में चार सौ पन्नों में अफसरों के बयान हैं और दो सौ में नतीजा है। हितेश शर्मा ने अपनी ही खबर को आगे बढ़ाया है कि मंदिर की जमीन पर कहीं शराब की दुकान चल रही है तो कहीं कॉलोनी काट दी है। मामला इंदौर का ही है। इंदौर फ्रंट पेज से पता चल रहा है कि कनाडिया जंक्शन, चाणक्यपुरी और खजराना चौराहे पर लेफ्ट टर्न चौड़े होंगे। उनतीस लाख की कोकीन के साथ विदेशी महिला गिरफ्तार है। मुंबई से

साफ सड़कें तो मिलीं, पर आंगन छूट गया!

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साफ सड़कें तो मिलीं, पर आंगन छूट गया!

विदेश में बसने की बात आते ही सबसे पहले वही तस्वीर आती है, साफ सड़कें, बेहतर कमाई, बच्चों का अच्छा भविष्य और ऐसी जिंदगी जहां रोजमर्रा की धक्कामुक्की कम हो। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और दूसरे देशों से लाखों लोग इसी उम्मीद में खाड़ी देशों, यूरोप, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की तरफ देखते हैं। घर वाले भी यही सोचते हैं कि लड़का या लड़की बाहर चला गया तो जिंदगी बन गई। शादी-ब्याह में भी एनआरआइ रिश्ता कई बार इसी तरह पेश किया जाता है, पर असल कहानी इतनी सीधी नहीं है। परदेस में जिंदगी बनती भी है और कई बार टूटती भी है। विदेश की जिंदगी में सुविधा है लेकिन सहारा कम है। सड़क साफ मिल जाती है लेकिन दरवाजा खटखटाने वाली पड़ोसन नहीं मिलती। हवा बेहतर मिल जाती है, लेकिन अपनेपन की सांस छोटी हो जाती है। बड़े-बड़े घरों में रहने वाले कई अंदर से बहुत अकेले होते हैं। सुबह काम, फिर घर, खाना, सफाई, बच्चों की जिम्मेदारी और अगले दिन वही चक्र। यहां नौकर-चाकर, घर का सहारा, रिश्तेदारों की आवाजाही और मोहल्ले की मदद जैसी चीजें पीछे छूट जाती हैं। जो काम अपने देश में बंट जाते थे, बाहर वही काम इंसान के कंधे पर आ गिरते हैं। सबसे ज्यादा असर उन महिलाओं पर पड़ता है जो शादी के बाद विदेश पहुंचती हैं और वहां की असल जिंदगी से पहली बार टकराती हैं। बाहर से देखने पर लगता है कि विदेश में रहती हैं इसलिए खुश होंगी, पर कई बार उनका पू

काश! मां-बाप का चेहरा देख पाती!

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काश! मां-बाप का चेहरा देख पाती!

कुछ हादसे शरीर पर निशान छोड़ते हैं, कुछ पूरी जिंदगी पर। कश्मीर की इंशा मुश्ताक की कहानी अलग है। जुलाई 2016 में वह करीब चौदह बरस की थीं। घर की खिड़की से बाहर का माहौल देख रही थी कि पैलेटगन से निकले छर्रे उनके चेहरे और आंखों में आ लगे। कुछ ही पलों में वह दुनिया, जिसे इंशा रोज देखती थीं, हमेशा के लिए अंधेरे में चली गई। उस दिन इंशा ने सिर्फ रोशनी नहीं खोई, मां-बाप, छोटे भाइयों की शक्ल खो दी, गांव की गलियां, बाजार, फूल, पेड़, आसमान और पानी का रंग खो दिया। आज करीब दस बरस बाद भी उसकी सबसे ख्वाहिश बड़ी नौकरी, पैसा या शोहरत नहीं है, वह सिर्फ इतना चाहती है कि एक बार माता-पिता का चेहरा फिर देख पाती। इंशा डॉक्टर बनना चाहती थीं। जिंदगी ने रास्ता ही बदल दिया। कई महीने इलाज चला, उम्मीद टूटी, हिम्मत भी जवाब देती रही। फिर उसने ब्रेल सीखी और दोबारा पढ़ाई शुरू की। 2018 में दसवीं पास की, 2023 में बारहवीं और अब ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही हैं। जिस लड़की से उसकी आंखें छीन ली गईं, उसने जिंदगी से हार मानने से इनकार कर दिया। इंशा आज भी जिंदगी जी रही है, पढ़ रही है, घर के काम कर रही है और अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रही है लेकिन उसकी बात अंदर तक चुभती है कि मां-बाप को फिर देख पाती। हम जिन चेहरों को रोज देखकर भी अनदेखा कर देते हैं, किसी के लिए वही चेहरा जिंदगी की सबसे बड़ी अधूरी ख्वाहिश हो सकता है।

इतनी बुद्धि इनको देना दाता…!

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इतनी बुद्धि इनको देना दाता…!

कभी-कभी लगता है कि वाकई अक्ल, चारा खाने जाती है। बताइए, पुल की मजबूती नापने का हमारे पास कोई माकूल तरीका ही नहीं है! कहीं ट्रक चढ़वाए जाते हैं तो कहीं कर्मचारियों को जान पर खेलने के लिए पुल पर कुदवाया जाता है। आश्चर्य कि भोपाल के कान-आंख क्या इस कदर बंद हैं कि वहां से सवाल तक नहीं! उज्जैन के महाकाल मंदिर की सुरक्षा और संचालन कितने काबिल(?) हाथों में है, नमूना देखिए कि नागचंद्रेश्वर मंदिर की सीढ़ी और पुल की मजबूती जांचने के लिए तीन सौ कर्मचारी चढ़ाकर कुदवाए गए! तकनीक के इस जमाने में मजबूती नापने का यह तरीका अपने में अनोखा है। आमतौर पर इंजीनियर क्वालिटी, सामग्री की मजबूती और मानकों के आधार पर तय करते हैं कि कितना भार उठा पाएगा। ऐसे तो तय हो नहीं सकता कि आज तीन सौ लोग कुदवा लिए तो सिंहस्थ की भीड़ में पुल जवाब नहीं देगा! सिंहस्थ में क्या केवल तीन सौ लोग ही जाएंगे? जो भीड़ जाएगी, क्या वह कूदेगी, यह देखने के लिए कि पुल टूटता है कि नहीं! कमाल के मूढ़मति हैं, जो मजबूती जांचने के जाने किस जमाने के फार्मूले इस्तेमाल कर रहे हैं। यह सही तरीका है किसी बड़ी भीड़ की तैयारी का न कि बंदरों की तरह उछलकूद का। यदि इस कूदा-फांदी में वाकई पुल टूट जाए और कर्मचारी नीचे आ गिरें तो? सिंहस्थ की तैयारियों पर उज्जैन में ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ चल रहा है। करोड़ों की लागत का पुल रास्ता भटक जाता है और खेत में उतर

कुंभ के लिए करोड़ों... तालीम पर धेला भर नहीं!

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कुंभ के लिए करोड़ों... तालीम पर धेला भर नहीं!

हम बच्चों से बहुत उम्मीद रखते हैं। चाहते हैं कि दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकतों से मुकाबला करें, ए आइ की लड़ाई में सबसे आगे रहें, चांद पर जाएं, दुनिया की बड़ी कंपनियों में सीइओ बनें और भारत को विकसित देश बनाएं, लेकिन इस उम्मीद की शुरुआत आखिर होती कहां से है? छोटे से स्कूल की शुरुआती कक्षा, साफ-सुथरी बेंच, बेहतरीन शिक्षक, ब्लैकबोर्ड, साफ पीने के पानी और शौचालय से। उस किताब से, जिसे बच्चा पढ़ और समझ सके। हम इमारत बहुत ऊंची बनाना चाहते हैं, पर उसकी नींव को लेकर उतने बेचैन नहीं हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्न बी. वराले ने नासिक में जो कहा, वह बेचैन करता है। उन्होंने महाराष्ट्र में मराठी स्कूलों की हालत पर चिंता जताते हुए कहा कि सरकार कुंभ के लिए हजारों करोड़ रुपए खर्च कर रही है। उसमें से सिर्फ 0.1 फीसद, यानी करीब बत्तीस करोड़ रुपए तालीम पर खर्च होते तो सौ-डेढ़ सौ मराठी स्कूल बंद होने से बच सकते थे। अगर हम दुनिया के बेहतरीन एयरपोर्ट और एक्सप्रेसवे बनाने की सोच रखते हैं तो बच्चों के लिए बेहतरीन स्कूल क्यों नहीं बना सकते? यही वह सवाल है, जिसे आज राजस्थान से लेकर उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र तक माता-पिता और शिक्षक उठा रहे हैं। सरकारी स्कूलों के विलय और वन स्कूल-वन कैंपस जैसी कवायद के खिलाफ बच्चों, शिक्षकों और माता-पिता का विरोध इसी बेचैनी को बताता है। महाराष