इतनी बुद्धि इनको देना दाता…!

कभी-कभी लगता है कि वाकई अक्ल, चारा खाने जाती है। बताइए, पुल की मजबूती नापने का हमारे पास कोई माकूल तरीका ही नहीं है! कहीं ट्रक चढ़वाए जाते हैं तो कहीं कर्मचारियों को जान पर खेलने के लिए पुल पर कुदवाया जाता है। आश्चर्य कि भोपाल के कान-आंख क्या इस कदर बंद हैं कि वहां से सवाल तक नहीं! उज्जैन के महाकाल मंदिर की सुरक्षा और संचालन कितने काबिल(?) हाथों में है, नमूना देखिए कि नागचंद्रेश्वर मंदिर की सीढ़ी और पुल की मजबूती जांचने के लिए तीन सौ कर्मचारी चढ़ाकर कुदवाए गए! तकनीक के इस जमाने में मजबूती नापने का यह तरीका अपने में अनोखा है। आमतौर पर इंजीनियर क्वालिटी, सामग्री की मजबूती और मानकों के आधार पर तय करते हैं कि कितना भार उठा पाएगा। ऐसे तो तय हो नहीं सकता कि आज तीन सौ लोग कुदवा लिए तो सिंहस्थ की भीड़ में पुल जवाब नहीं देगा! सिंहस्थ में क्या केवल तीन सौ लोग ही जाएंगे? जो भीड़ जाएगी, क्या वह कूदेगी, यह देखने के लिए कि पुल टूटता है कि नहीं! कमाल के मूढ़मति हैं, जो मजबूती जांचने के जाने किस जमाने के फार्मूले इस्तेमाल कर रहे हैं। यह सही तरीका है किसी बड़ी भीड़ की तैयारी का न कि बंदरों की तरह उछलकूद का। यदि इस कूदा-फांदी में वाकई पुल टूट जाए और कर्मचारी नीचे आ गिरें तो?
सिंहस्थ की तैयारियों पर उज्जैन में ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ चल रहा है। करोड़ों की लागत का पुल रास्ता भटक जाता है और खेत में उतर जाता है! इससे बड़ी लापरवाही क्या हो सकती है कि सड़क ही छोड़ दे। बन रही सड़कों और डिवाइडरों में प्लास्टिक के सरिये लगाए जा रहे हैं। क्या ये भारी भीड़ का दबाव सहन कर पाएंगे? ये नमूने बता रहे हैं कि सिंहस्थ के नाम पर क्या चल रहा है और क्या होगा। कोई अनहोनी न हो कि देखने वाला कोई नहीं, जबकि अभी सरकार उज्जैन की ही है।