बीस साल से आंदोलन में...

‘‘बरफ के ठेले पर अब बाबूजी रहते हैं। मैं पत्रकार हो गया हूं। ‘द वायर’ के लिए रिपोर्टिंग करता हूं। दिल्ली पुलिस को खूब खटक रहा हूं। कभी थाने बुला लेते हैं, तो कभी धमकाते हैं। झल्लाए हुए हैं कि बिना पढ़ा-लिखा… गरीब-गुरबा, नामी संस्थान का हिस्सा कैसे बन गया।’’ ये कहना है इरफान का।
बताते हैं कि नजर में तो अब आया हूं, लेकिन बीस साल से आंदोलन में हूं। अण्णा हजारे के पीछे भी बैठा था और केजरीवाल की भूख-हड़ताल में भी शामिल था। कभी स्कूल नहीं गया हूं। हिंदी पढ़ने-समझने के लिए भी गूगल का सहारा लेना पड़ता है।
मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे वाले आंदोलन में नाम हो गया। उनके इस्तीफे के बाद बरफ के ठेले पर खड़ा था। एक शख्स आया और कहा कि आपसे बात करना है, अलग आइए। उसके साथ गया।
उसने फोन लगाया और राहुल गांधी से बात करा दी। राहुल ने पूछा- पहचाना… राहुल गांधी बोल रहा हूं। शक हुआ कि कोई मजाक कर रहा है। फिर उन्होंने यकीन दिला दिया और मिलने बुलाया, तारीफ की। मदद का वादा भी किया।
इरफान बताते हैं कि परेशान लड़की से मुझसे मदद मांगी थी। मैंने इंस्टाग्राम पर अपील की, तो 75 हजार फॉलोअर बढ़ गए। मेरा परिवार आज भी मुफलिसी में है। रोजी-रोटी की लड़ाई तो नहीं जीत सकते… लिहाजा, पत्रकारिता का झंडा उठा लिया है। मेरा मानना है कि पढ़ाई कतई जरूरी नहीं है। हर वो शख्स पत्रकार है, जो सवाल पूछने की हिम्मत और नीयत रखता है।