भाजपा जीते तो बेईमानी, हारे तो चालाकी!

· Indore

भाजपा जीते तो बेईमानी, हारे तो चालाकी!

देश की राजनीति अब उस मुकाम पर है, जहां चुनाव नतीजे समझने के लिए जादूगर चाहिए। भाजपा जीत जाए तो कहा जाता है कि चुनाव आयोग उसके कब्जे में है और भाजपा हार जाए तो उसने जानबूझकर विपक्ष को जिता दिया ताकि चुनाव आयोग बचा रहे। मतलब भाजपा जीतती भी मर्जी से है और हारती भी। विपक्ष बेचारा केवल जीतने या हारने का ढोंग करता है। पहले चुनाव में उम्मीदवार खड़े होते थे। अब कहानियां खड़ी होती हैं। वोट पड़ने से पहले कहानी, गिनती के दौरान कहानी बदलने को तैयार और नतीजा आने के बाद नई कहानी बाजार में। तथ्य बाद में आते हैं, शक पहले पहुंच जाता है। मान लीजिए भाजपा दस सीटें जीत गई। तुरंत कहा जाएगा, देखा, पूरा खेल तय था। एक सीट हार गई तो कहा जाएगा, जानबूझकर छोड़ी है। पांच हार गई तो कहा जाएगा कि जनता का गुस्सा ठंडा करने के लिए विपक्ष को ऑक्सीजन दी है। सरकार ही बदल जाए तो शायद कहा जाएगा कि सत्ता से हटना भी भाजपा की चाल है। भाजपा कोई राजनीतिक दल नहीं, ब्रह्मांड की ताकत है। बारिश कम हो तो उसकी योजना, ज्यादा हो तो चाल। विपक्ष जीते तो भाजपा की मेहरबानी, विपक्ष हारे तो भाजपा की ताकत। मतदाता केवल अंगूठा लगाने वाला कलाकार है, पटकथा कहीं और लिखी जाती है। ऐसी राजनीति में सबसे बड़ा अपमान चुनाव आयोग का नहीं, मतदाता का होता है। जनता से कह रहे हैं कि तुम्हारा वोट मायने नहीं रखता। तुमने किसी उम्मीदवार को जिताया नहीं, सिर्फ यह भ्रम दिया है कि तुमने उसे जिताया है। गांव का किसान, शहर का मजदूर, नौकरी खोजता नौजवान और राशन की लाइन में खड़ी महिला सब मूर्ख हैं। असली समझ सिर्फ सोशल मीडिया के उन महान विद्वानों के पास है जो नतीजा आते ही पर्दे के पीछे की पूरी कहानी जान लेते हैं। चुनाव आयोग पर सवाल उठने चाहिए। मशीनों पर शक हो तो जांच होनी चाहिए। मतदाता सूची में गड़बड़ी हो तो जवाब मांगा जाना चाहिए। पैसे, प्रशासन और मीडिया के बेजा इस्तेमाल पर विपक्ष को लड़ना चाहिए।

लोकतंत्र भरोसे पर चलता है लेकिन भरोसा मांगने से नहीं, साफगोई से मिलता है। आरोप और सोच में फर्क होता है। किसी सीट पर हार को साजिश साबित करने के लिए सबूत चाहिए। केवल यह कहना कि सत्ता ने विपक्ष को जिता दिया, वैसा ही है जैसे कोई छात्र परीक्षा में फेल होकर कहे कि मास्टर ने जानबूझकर कम नंबर दिए और पास हो जाए तो दावा करे कि मास्टर ने ईमानदारी दिखाने के लिए पास किया है।

ऐसी बातों की सबसे बड़ी सुविधा यही है कि वह कभी गलत नहीं होता। जीत मिली तो शक सही, हार मिली तो शक और मजबूत। इसे न जांचा जा सकता है, न खारिज। यह राजनीति नहीं, राशिफल है। विपक्ष को भी तय करना होगा कि उसे जनता की जीत चाहिए या साजिश की कहानी क्योंकि जिस दिन वह हर जीत को भी भाजपा की चाल बताने लगेगा, उसी दिन वह अपनी मेहनत, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं का अपमान कर देगा।

अगर सचमुच भाजपा ही विपक्ष को जिताती है तो विपक्ष को चुनाव प्रचार बंद करके धन्यवाद समारोह शुरू कर देना चाहिए। पोस्टर लगने चाहिए- हमें जिताने के लिए भाजपा का हार्दिक आभार। लोकतंत्र में शक जरूरी है लेकिन ऐसा शक जो हर जवाब को पहले ही झूठ मान ले, वह सवाल नहीं रहता। वह धीरे-धीरे बीमारी बन जाता है।