साफ सड़कें तो मिलीं, पर आंगन छूट गया!

विदेश में बसने की बात आते ही सबसे पहले वही तस्वीर आती है, साफ सड़कें, बेहतर कमाई, बच्चों का अच्छा भविष्य और ऐसी जिंदगी जहां रोजमर्रा की धक्कामुक्की कम हो। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और दूसरे देशों से लाखों लोग इसी उम्मीद में खाड़ी देशों, यूरोप, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की तरफ देखते हैं। घर वाले भी यही सोचते हैं कि लड़का या लड़की बाहर चला गया तो जिंदगी बन गई। शादी-ब्याह में भी एनआरआइ रिश्ता कई बार इसी तरह पेश किया जाता है, पर असल कहानी इतनी सीधी नहीं है। परदेस में जिंदगी बनती भी है और कई बार टूटती भी है।
विदेश की जिंदगी में सुविधा है लेकिन सहारा कम है। सड़क साफ मिल जाती है लेकिन दरवाजा खटखटाने वाली पड़ोसन नहीं मिलती। हवा बेहतर मिल जाती है, लेकिन अपनेपन की सांस छोटी हो जाती है। बड़े-बड़े घरों में रहने वाले कई अंदर से बहुत अकेले होते हैं। सुबह काम, फिर घर, खाना, सफाई, बच्चों की जिम्मेदारी और अगले दिन वही चक्र। यहां नौकर-चाकर, घर का सहारा, रिश्तेदारों की आवाजाही और मोहल्ले की मदद जैसी चीजें पीछे छूट जाती हैं।
जो काम अपने देश में बंट जाते थे, बाहर वही काम इंसान के कंधे पर आ गिरते हैं। सबसे ज्यादा असर उन महिलाओं पर पड़ता है जो शादी के बाद विदेश पहुंचती हैं और वहां की असल जिंदगी से पहली बार टकराती हैं। बाहर से देखने पर लगता है कि विदेश में रहती हैं इसलिए खुश होंगी, पर कई बार उनका पूरा दिन घर की दीवारों के बीच गुजर जाता है। भाषा, लोग, मौसम अलग और अपना कहने वाला कोई नहीं। पति काम में व्यस्त, बच्चे स्कूल में और वह खुद ऐसी जिंदगी में फंस जाती है जहां शिकायत करने पर जवाब मिलता है कि तुम्हें और क्या चाहिए, तुम तो विदेश में हो। यही सबसे बड़ा धोखा है। जगह बदलने से दिल की जरूरतें खत्म नहीं होतीं।
एनआरआइ सपना कई घरों में रिश्ते का बोझ भी बन जाता है। शादी से पहले चमक दिखाई जाती है, बाद में अकेलापन सामने आता है। परिवार सोचता है कि लड़की बाहर जाकर राज करेगी जबकि सच में वह कई बार रसोई, सफाई, बच्चों और चुप्पी के बीच पिसती रहती है। जिस रिश्ते को बेहतर जिंदगी का टिकट माना जाता है, वही रिश्ता कभी-कभी भावनात्मक कैद बन जाता है। बाहर की दुनिया में इज्जत बचाने के लिए कई लोग दर्द को छुपाते रहते हैं क्योंकि वापस लौटना नाकामी समझ लिया जाता है।
यह भी सच है कि विदेश में रहने वाले हर इंसान की जिंदगी दुख भरी नहीं होती। कई मेहनत से आगे बढ़ते हैं, बच्चों को बेहतर माहौल देते हैं और परिवार को मजबूत बनाते हैं, पर समस्या तब शुरू होती है जब हम विदेश को पूरा सच मान लेते हैं और अपने देश की जिंदगी को सिर्फ परेशानी। हर चमक तरक्की नहीं होती और हर सुविधा सुकून नहीं देती। पैसा जरूरी है लेकिन अगर रिश्ते टूट जाएं, मन खाली हो जाए और इंसान अपने ही घर में मेहमान जैसा जीने लगे तो फिर कमाई का हिसाब अधूरा है।
असल बात यह है कि विदेश जाने से पहले सिर्फ नौकरी, वीजा, घर और कमाई का हिसाब नहीं होना चाहिए। यह भी सोचना चाहिए कि वहां भावनात्मक सहारा कैसा होगा, रिश्ते कैसे निभेंगे, घर का काम कैसे बंटेगा, पत्नी या पति की अपनी जिंदगी क्या होगी और बच्चे किस माहौल में बड़े होंगे। परदेस जाने का फैसला सिर्फ जेब का फैसला नहीं है। यह दिमाग, दिल, रिश्तों और पूरी जिंदगी का फैसला है।
परदेस बुरा नहीं है लेकिन परदेस को जन्नत समझ लेना नादानी है। अपने देश की दिक्कतें सच हैं लेकिन बाहर की खामोशी भी सच है। साफ सड़कें अच्छी हैं मगर इंसान सिर्फ सड़क पर नहीं जीता। उसे अपने लोग भी चाहिए, अपनी आवाज भी चाहिए और ऐसा घर भी चाहिए जहां वह सिर्फ जिम्मेदारियों का मजदूर न बन जाए। विदेश का सपना देखिए लेकिन आंखें खोलकर देखिए क्योंकि कई बार पासपोर्ट पर लगी मुहर जिंदगी को आसान नहीं और भी अकेला बना देती है।