मुशायरे में आंसू और रूमाल भी…!

इमरान प्रतापगढ़ी की नज्म ‘वालिद-ए-मोहतरम’ और उसे सुनते भावुक शायरा हिमांशी बाबरा की चर्चा है। कलाम सुनकर आँख भर आना बिल्कुल आम है मगर जब चर्चा नज्म से ज्यादा सुनने वाले के आँसुओं की होने लगे तो देखना चाहिए कि महफिल में शायरी कहाँ है और कैमरा किस तरफ घूम गया।
पिता पर लिखी नज्म सुनकर किसी को भी पिता याद आएगा ही। इमरान की नज्म सुनकर हिमांशी बाबरा भावुक हुईं तो उनके जज्तबा पर फैसला सुनाने वाले हम कौन। शायर ने पूरी नज्म पढ़ी हो और सुनने वाले ने पूरे दिल से सुनी हो फिर भी मोबाइल पर पहुँचने के बाद दोनों के हिस्से बदल सकते हैं। नज्म की दो पंक्तियाँ और रोते हुए चेहरे की चार तस्वीरें। ऊपर मोटे अक्षरों में लिख दीजिए, ‘खुद को रोने से नहीं रोक पाईं।’ अब बताइए नज्म सुनने आएगा या यह देखने कि कौन कितना रोया।
पहले मुशायरे से लौटकर पूछा जाता था कि किसने अच्छा पढ़ा। अब पूछने को यह भी है कि किसने किसे रुलाया। इस हिसाब से बेचारे उस शायर का क्या होगा जो रात भर अच्छी गज़ल पढ़ता रहा मगर किसी की आँख से एक बूँद नहीं निकलवा सका। क्या अगली बार आयोजक उससे कहेगा कि जनाब आपके शेर तो ठीक थे मगर हमारे कैमरे वाले को कुछ मिला नहीं।
सबसे ज्यादा मुश्किल उस सुनने वाले की है जो चुपचाप महसूस करता है। बगल में बैठे साहब ने रूमाल निकाला और महफिल उनके नाम हो गई। खामोशी से शायरी सुनना भी घाटे का सौदा लगे तो हैरत कैसी! जरा उस नए लड़के के बारे में भी सोचिए जो इन महफिलों को देखकर शायर बनने का सपना पाल रहा है। वह किताब खोले या कैमरे का रास्ता देखे। शेर पर मेहनत करे या उसे पढ़ते समय कहाँ आवाज भारी करनी है। इसका अभ्यास करे। उसे यह भरोसा कौन दिलाएगा कि अच्छी शायरी की पहचान सिर्फ सामने भीगे चेहरे नहीं हैं।
इसी तरह चलता रहा तो नई हिदायत छप सकती है, ‘मुशायरा रात नौ बजे शुरू होगा। माँ और पिता पर नज्म के समय कैमरे चालू रहेंगे। श्रोता अपना रूमाल साथ लाएँ। जो भावुक होकर भी आँसू नहीं निकाल पाते कृपया पीछे बैठें।’ शायरी दिल को छुएगी तो आँख भी भर सकती है। खराबी तब है जब शेर की जगह आंसू लेने लगें और किसी की याद महफिल का प्रचार बन जाए। इमरान का कलाम हो या हिमांशी की आँखों की नमी दोनों को समझने के लिए थोड़ा ठहराव चाहिए। हर एहसास पर ‘वायरल’ की पर्ची चिपकाना जरूरी नहीं है। मुशायरे में रूमाल जरूर ले जाइए, लेकिन लौटते समय जेब में दो अच्छे शेर भी होने चाहिए। आखिर हम शायरी सुनने गए थे।