गालिब से अलग अंदाज में मिलना है तो...!

ओमा द अक्, यह नाम जितना अलग है, वे खुद भी आम नहीं हैं। अध्यात्म पर तो बात करने वाले कई हैं, लेकिन उर्दू-अदब पर ओमा को सुनना अलग ही अनुभव है।
यू-ट्यूब चैनल ‘ओमा द अक्’ के साझा आँकड़ों में 1 लाख 78 हजार सब्सक्राइबर और 948 वीडियो हैं। बनारस से शुरू बातचीत में फिर शहर लौट आता है। कभी घाट की गंभीरता के साथ तो कभी गलियों की रौनक लेकर। वहीं से धर्म, कविता और रोज की जिंदगी की बातें एक-दूसरे से जुड़ती चली जाती हैं।
इंदौर में 30 अक्टूबर की शाम 5 बजे, रवीन्द्र नाट्यगृह में वाणी साहित्य उत्सव के दौरान कृतिका देसाई ‘बुद्ध: आध्यात्मिक घटना या दुर्घटना? विषय पर बात करेंगी। शाम छह बजे मुशायरे में भी शामिल रहेंगे! ओमा उपाध्याय का जन्म बनारस में पंडित हरिहर नाथ शास्त्री और मां का नाम विद्यावती देवी के यहां हुआ। इन्हीं ओमा उपाध्याय की पहचान ‘ओमा द अक्’ के नाम से बनी। कोई अध्यात्म वक्ता तो कोई कवि और लेखक के तौर पर जानता, मानता है। ज्योतिष, फिल्में और फोटोग्राफी भी उनका हिस्सा है, लेकिन इन सबके पीछे दिखाई देता है, बनारस। वहीं बचपन बीता और उसी का असर सोच से बातचीत में नजर आता है।
धर्म की किताबें पढ़ने और ध्यान का सिलसिला कम उम्र में शुरू हुआ और बोलने तक पहुंचा। 16 साल की उम्र में प्रवचन शुरू किया। शुरुआती बातचीत धर्म पर थी। फिर इंसान की जिंदगी, परेशानियां, समाज और साहित्य भी शामिल हो गए। बात कई रास्तों पर बढ़ने लगी। किताबे पसंद थीं, लेकिन कॉलेज के तय ढांचे में मन नहीं लगा। बीए का पहला साल पास करने के बाद कॉलेज छोड़ दिया। पढ़ना-लिखना जारी रहा। हिंदी और उर्दू में कविताएं लिखीं। लेख, कहानियां और नाटक भी लिखे। कलम के साथ कैमरे में भी दिलचस्पी रही। उन्होंने छोटी फिल्में, दस्तावेजी फिल्में और संगीत वीडियो बनाए। तस्वीरें खींचना भी शौक में शामिल हुआ।
बनारस में श्मशान की खामोशी है तो गलियों की रौनक भी। ओमा के स्वभाव में दोनों रंग हैं। अंदर काशी का श्मशान जागता है तो चाट-गोलगप्पे वाला बनारस जागता है, तो इस अंदाज को शहर की देन मानते हैं।
उनके नाम के साथ जुड़ा ‘अक्’ सोच और संस्था का हिस्सा है। इसमें अनंत और कण की बात करते हैं। ‘अक्’ संस्था (2001) शुरू हुई। ‘हम भारत हैं’, ‘हरियाली काशी, मतवाली काशी’ और गाली-गलौज के खिलाफ ‘भारत अगेंस्ट अब्यूज’ जैसे अभियान जुड़े। जागृत मतदाता मंच (2013) शुरू हुआ, जिसका मकसद लोगों को मतदान और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए जगाना था। इस तरह उनके काम में समाज और नागरिक जीवन के सवाल भी जगह बनाते गए।
साहित्य का उनकी तरफ ध्यान तब गया जब उनका पहला कविता संग्रह ‘महंगी कविता’ आया। वाणी प्रकाशन से आई इस किताब का मूल्य 25 हजार रुपये रखा गया। कविता की किताब के लिए इतना दाम सुनकर चौंके। पुस्तक मेलों में कई लोग उसे खरीदने आते थे तो कई केवल देखने, आखिर इतनी महंगी किताब कैसी है।
इस बड़ी कीमत के पीछे ओमा का तर्क था। आदमी कपड़ों और जूतों पर हजारों रुपये खर्च कर देता है लेकिन किताब और ज्ञान सस्ते चाहता है। पहले संस्करण की करीब 200 प्रतियां बिकने की जानकारी दी थी। अब उनकी कविताएं ‘हम इक्कीसवीं सदी से आते हैं’ भी है, जिसका दाम 395 रुपये है।
ओमा चाहते हैं, किताब पढ़ी भी जाए। घर की अलमारी भरने के लिए खरीदी गई किताब में उनकी दिलचस्पी नहीं। खुद भी वही किताबें खरीदते हैं, जिन्हें पढ़ना चाहते थे। कभी किताब के नाम ने खींचा तो कभी उसके विषय ने। अपने पाठक को भी वे यही जगह देते हैं। पढ़कर पसंद करे या नापसंद, लेकिन पहले जानें कि लिखा क्या है।
उनकी कविताओं में मां है, जिसकी थकान घरवालों को दिखाई नहीं देती। गरीब घर की ईद है, जहां बच्चों की खुशी के साथ खर्च की चिंता भी है। किसान और मजदूर हैं। गंगा की हालत है और बदलता बनारस है। कम होती गौरैया और खेत की मिट्टी भी उनके लेखन में आती है। अपने शहर की खूबसूरती देखते हुए उनकी नजर उन चीजों पर भी है, जो धीरे-धीरे गायब हो रही हैं।
उर्दू शायरी पर मीर, इकबाल और गालिब को जिंदगी से जोड़ते हैं। मीर के यहाँ बिछड़ने और खोने का दर्द मिलता है। इकबाल से हौसला और आगे बढ़ने की बात निकलती है। गालिब सवाल करने और अपनी उलझनों को पहचानने की जगह देते हैं। ये शायर केवल किताबों के नाम बनकर नहीं रह जाते। उनके शेर सुनने वाले के अपने अनुभवों के करीब पहुँचते हैं।