गुदड़ी में लाल नहीं, लाली भी...!

· Indore

मलीषा खारवा
मलीषा खारवा

मलीषा खारवा को मॉडलिंग का बड़ा काम मिला तो सबसे बड़ी खुशी यह थी कि अब पापा को बच्चों का पेट भरने के लिए अपना खाना नहीं छोड़ना पड़ेगा। कैमरे के सामने खड़ी एक लड़की की मुस्कान के पीछे इतना दर्द क्या है? दुनिया उसकी खूबसूरती देख रही थी और वह अपने घर की भूख कम होने पर खुशी महसूस हो रही थी।

मुंबई के बांद्रा में समुद्र किनारे झुग्गी में मलीषा का बचपन बीता। पिता और भाई के साथ ऐसा ठिकाना था जिसे बार-बार बनाना पड़ता था। लकड़ियों के सहारे घर खड़ा होता और ऊपर कुछ डालकर धूप से बचने का इंतजाम किया जाता। नगर निगम की कार्रवाई में वह टूट जाता तो परिवार फिर उसे जोड़ने लगता। बिजली और पानी भी आसानी से पूरा नहीं मिलता। इन्हीं हालात में मलीषा मॉडल और डांसर बनने का सपना देखती थीं।

बच्चों के कार्यक्रमों में जोकर बनकर पिता परिवार चलाते थे। दूसरों के बच्चों को हँसाने से मिलने वाले पैसों से अपने बच्चों की जरूरतें पूरी करते थे। कमाई इतनी नहीं थी कि हर जरूरत आसानी से पूरी हो जाए। बेटी के सपने सिर्फ इसलिए छोटे नहीं हुए कि घर छोटा था।

अमेरिकी अभिनेता और डांसर रॉबर्ट हॉफमैन से मुलाकात ने मलीषा के लिए रास्ता खोला। उनका वीडियो बना और सोशल मीडिया पर पहुँचा। लोगों ने उस चेहरे को पहचाना जिसमें यकीन और खुली मुस्कान थी। धीरे-धीरे मॉडलिंग के काम मिलने लगे। बड़े ब्रांड फॉरेस्ट एसेंशियल्स ने उन्हें अपने ‘युवती’ अभियान का चेहरा बनाया। मलीषा को अपने सांवले रंग से प्यार है।

मॉडलिंग की कमाई से मलीषा ने परिवार के लिए घर खरीदा। उस घर में बिजली थी। छत पर पंखा था। नल में पानी आता था। मलीषा ने पढ़ाई को भी अपनी जरूरत माना। आगे बढ़ने के मौके मिले तो उनके साथ पढ़ने का इरादा भी बना रहा। वह कहती हैं, झुग्गी बस्ती ने मुझे जीना सिखाया और अब मैं प्रेरणा बनना चाहती हूं कि बाकी लड़कियां भी मेरी तरह हों सकती हैं!