कहीं दीप जले, कहीं दिल!

प्रधानमंत्री के जन्मदिन से पहले टीवी पर भारतीय जनता पार्टी के सदस्य कह रहे थे कि नरेंद्र मोदी के लिए शाम छह और सात बजे के बीच ‘आशीर्वाद का दीया’ जरूर जलाना। आदेश समझ कर दीया जलाया। जलाते समय अखिलेश यादव से सुना कि देश के कई हिस्सों में बाढ़ से लोग तकलीफ में हैं। इसके बाद कई लोगों ने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री ने तेल बचाने के वास्ते इस्तेमाल कम करने को कहा था।
जन्मदिन के पहले भारतीय जनता पार्टी के पदाधिकारियों और नरेंद्र मोदी के मंत्रियों से उनकी इतनी तारीफ सुनी कि खुशामद लगी। दिन भर समाचार चैनल देखना पत्रकारों के लिए जरूरी है। सोशल मीडिया पर ताजी खबर की तलाश में रहती हूं, सो उस दिन इतने लोग मोदी की तारीफ करते दिखे कि सोचने लगी कि उन्हें क्यों इस किस्म की खुशामद की जरूरत रहती है। शायद इसलिए कि... जब से कॉक्रोच जनता पार्टी वालों ने स्कूलों को ठीक करने के लिए मुहिम चलाई है, प्रधानमंत्री का भरोसा कम हो गया है!
बारह बरस के मोदी के कार्यकाल में पहली बार अगर किसी ने उनका मजाक बनाने की हिम्मत दिखाई है तो ‘कॉक्रोचों’ ने। बार-बार रील दिखती हैं, जिसमें मोदी को निशाने पर रख कर नौजवान न सिर्फ हैं प्रधानमंत्री के मीम बनाते, बल्कि यह भी साबित करते हैं कि नेताओं की ताकत से डरते नहीं हैं। अभी तक होता यह था कि देश में कि प्रधानमंत्री की आलोचना चोरी-छिपे हुआ करती थी, क्योंकि मोदी ने कई बार जतलाया कि आलोचना पसंद नहीं है। अब ऐसे नौजवान सामने हैं, जो देश में कमियां दिखाते नहीं थकते हैं। स्कूल ठीक करने वाली मुहिम ने विद्यालयों की गिरती इमारतें, गरीब देहाती लोगों के झुग्गीनुमा मकान दिखाए हैं और यह भी दिखाया कि कई ऐसे गांव हैं, जहां पीने का पानी इतना गंदा है कि मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों में बच्चों की मौत हो रही है।
देखा जाए तो ये ‘कॉक्रोच’ देश की सेवा कर रहे हैं। अच्छा होता कि प्रधानमंत्री अपने मुख्यमंत्रियो को आदेश देते कि जहां-जहां स्कूलों की इमारतें जर्जर हैं, जन्मदिन का जश्न मनाने के तौर पर उनकी फौरन मरम्मत की जाए। खुद कह चुके हैं कि बच्चे देश का कल हैं, तो कितना अच्छा लगता कि लाखों दीये जलाने के बदले स्कूल ठीक करने का आदेश देते।
मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में इन चीजों पर बहुत ध्यान दिया था। लालकिले की प्राचीर से स्वच्छ भारत अभियान घोषित किया। इसके बाद देहातों में इतने शौचालय बने कि कई जगह पर खुले में शौच करना बंद हो गया। मैंने खुद के गांव में इस बदलाव को देखा है, पर यह भी देखा है कि महाराष्ट्र के इस अमीर गांव में आदिवासियों के लिए जो स्कूल हैं, उनका बुरा हाल है। फायदा बच्चों को नहीं, अध्यापकों को इसलिए होता है कि गांव के हिसाब से उनकी तनख्वाह ज्यादा है। पूरे स्कूल के लिए सिर्फ दो शिक्षक हैं, जो हर विषय पढ़ाते हैं। ऐसे बच्चों को कैसे अच्छी शिक्षा मिलेगी, जिनके मां-बाप अनपढ़ होते हैं।
मोदी के दौर में ऐसा है कि जब खुद पहल करते हैं तो सुधार होता है। ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाते समय दुआ की कि प्रधानमंत्री बचे समय में उन चीजों पर फिर ध्यान देंगे, जिन पर उन्होंने पहले कार्यकाल में ध्यान दिया था। देश को नया संसद भवन, एक्सप्रेस-वे, हवाईअड्डे मेडिकल कॉलेज मिले हैं। ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ वाला नारा मिला है। कई भाजपा शासित राज्यों में महिलाओं को ‘लखपती दीदी’ और ‘ड्रोन दीदी’ बना दिया है।
मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं विकास की गति बढ़ी है, पर समझना मुश्किल है कि मोदी को इतने खुशामदियों की क्या जरूरत है? खुशामदी हर बड़े नेता के करीब होने की कोशिश करते हैं, लेकिन जिनकी खुशामद करते हैं उनका अकसर नुकसान करते हैं लाभ पहुंचाने के बदले। जिस राजनेता को तारीफ सुनने की आदत पड़ जाती है, वह ताकतवर होने के बजाय कमजोर होता है और फिर आलोचना थोड़ी-सी भी हो तो तकलीफ देती है।
मोदी कईबार कहते हैं कई उनको आलोचक पसंद हैं, लेकिन आलोचना सही होनी चाहिए, उलट नहीं। यही तो हो रहा है इन दिनों प्रधानमंत्रीजी। स्कूल ठीक करो अभियान सही है, लेकिन अब उत्तर प्रदेश में स्कूलों को ठीक करने के बदले कॉक्रोच पार्टी वालों को भगाने का काम हो रहा है। ऐसा करना उलट नहीं तो और क्या है? प्रधानमंत्रीजी सबसे काम है शिक्षा में सुधार लाना।
सच तो यह है कि प्रधानमंत्री के इस जन्मदिन को जब याद करूंगी तो याद आएंगे छोटे बच्चे, जो दीयों में से तेल बोतलों में डाल कर घर लेकर गए थे, ताकि खाना पकाने में काम आए। जलते दीये कम याद आएंगे।