सितार और गिटार से...‘ज़िटार’

Noushad Khan · · Indore

सितार और गिटार से...‘ज़िटार’

सितार और गिटार को मिलाकर भारतीय सितार वादक नीलाद्रि कुमार ने ‘ज़िटार’ बनाया था। उन्होंने रॉक गिटार को सितार से निकालने की चाह में सितार के तार बीस से पांच कर दिए। मूवी ‘बंटी और बबली’ के ‘चुप चुपके’, ‘ओंकारा’ का ‘नैना ठग लेंगे’, ‘दबंग-2’ के ‘तोरे नैना बड़े दगाबाज़ रे’ गीत में उन्होंने सितार का प्रयोग किया तो ‘गैंगस्टर’ मूवी के ‘ना जाने कोई’ में ‘ज़िटार’ का। उन्होंने ‘अ लाइफ़ इन ए मेट्रो’ के ‘अलविदा’ गीत में ‘धूम-2’ के ‘क्रेज़ी किया रे’ गीत में तथा ‘माज़ी’ के ‘मोरा जिया’ में भी ‘ज़िटार’ बजाया और अब ऋषभ शर्मा ने सितार को जेन ज़ी तक पहुँचाने के लिए नया लुक देकर चमका दिया है।

ऋषभ की एलईडी रोशनी वाली सितार, डीजे की सोच ने उनके रियाज़ को रील्स में और शास्त्रीय संगीत के समारोहों को क्लासिकल म्यूज़िक के aनाम के साथ जोश से भरे स्टेडियम में बदल दिया है। सितार ने पाँच सदियों से 20 तार से जगह बनाई है। ऋषभ रिखिराम शर्मा के सितार में 640 एलईडी बल्ब लगे हैं और उनके शब्दों में यह लाइटसेबर जैसी दिखती है। कंसर्ट की शुरुआत में प्राणायाम करवाते हैं। तब उनके ऊपर डिजिटल लहरें और बादल चक्कर काटते दिखते हैं; उनके हीरे जड़ित दाँत रोशनी में चमकते हैं। सितार वादन को भव्य बना देते हैं और कहते हैं, सारा मज़ा सिर्फ़ रैपर्स ही क्यों लें! ऋषभ (27) ने भारत के 11 शहरों का दौरा किया, जिसके शो हाउसफ़ुल रहे और तीन पीढ़ियों ने साथ आनंद लिया।

दिल्ली के डीडीए मैदान में उनका फ़ाइनल शो किसी अंतरराष्ट्रीय कंसर्ट जैसा भव्य था। आप उसे कोल्डप्ले जैसा कह सकते हैं। उसमें आतिशबाजी, विशाल बैकड्रॉप्स और कलाई पर बंधे रेडियो-नियंत्रित एलईडी रिस्टबैंड्स एक साथ जगमगा उठे थे। हम कह सकते हैं कि युवा वादक ने सितार को ताजगी से भर दिया है या यह केवल जादुई करतब जैसा है, शायद दोनों ही। ऋषभ शान से कहते हैं कि अगर बीस हजार लोग सितार कंसर्ट सुनने आ रहे हैं, तो हम आधिकारिक तौर पर पॉप की दुनिया में कदम रख चुके हैं।

पॉप म्यूज़िक लोकप्रिय संगीत ही तो है। अगर शास्त्रीय संगीत पॉप बन जाता है, तो यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। यह युवा रागों को ठीक वैसे ही पेश करता है जैसे कोई डीजे बजाता है। छोटी, जानी-पहचानी धुनें और ध्यान भटकने से पहले तुरंत अगली धुन पकड़ लेना। ऋषभ मंच से कूदकर बीच में चले जाते हैं, हाथ मिलाते हैं, और भीड़ में जोश भर देते हैं। तालियों और जयकारे से समाँ बन जाता है। फिर चमकती नेक्स्ट-जेन सितार को गिटार की तरह बजाते हैं, और कल हो ना हो तथा बॉलीवुड के कुछ अन्य मशहूर गानों की धुन छेड़ देते हैं।

जेन जी ने इसे ही ऑरा फ़ार्मिंग कहती है, शायद। ऋषभ दिल्ली के रिखीराम परिवार की चौथी पीढ़ी से हैं। उनका परिवार भारत के साज बनाने वाले परिवारों में से है। पहले गिटार सीखा था, क्योंकि उन्हें लगता था कि वह बहुत कूल है। उनके पिता ने जब देखा कि गिटार को बड़ी लापरवाही से यहाँ-वहाँ कहीं भी पटक देते थे और बिना हाथ धोए भी बजा लेते थे तो उन्होंने ऋषभ को सख़्त हिदायत दी।ऋषभ बताते- हैं पिता ने साफ-साफ कह दिया कि तुम सितार को बिल्कुल हाथ नहीं लगाओगे। यह रोक तब हटी जब ऋषभ (10) ने टूटा सितार हाथ में ले लिया, जिसे पिता ने ही दुरुस्त किया था। उसे बजाने लगे। टूटे सितार पर ही रियाज़ शुरू कर दिया। ऋषभ का दावा है कि पं. रविशंकर के शिष्य हैं, लेकिन अनुष्का शंकर इस दावे से इनकार करती हैं। ऋषभ कहते हैं कि गुरु और शिष्य के बीच का रिश्ता बहुत अलग होता है। कोई शिष्य कब तैयार हुआ, इसका फैसला खुद गुरु करते हैं, मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा। कुशल सितार कारीगर की पारिवारिक दुकान से व्हाइट हाउस और फिर न्यू यॉर्क से संगीत और अर्थशास्त्र में डिग्री हासिल की। दिल्ली के सनबर्न फ़ेस्टिवल में डेडमाऊ-5 का कंसर्ट भी था, जिसने सोच बदल दी। बताते हैं कि यह देखकर हैरान रह गया कि मैंने जो एलईडी माउस हेड पहना था, वह संगीत के साथ कितनी अच्छी तरह से तालमेल बैठा रहा था। फिर कोरोना के समय क्लब हाउस में बैठकर बिताया वह समय, जहाँ वे दिन-रात अजनबियों के सामने सितार बजाते थे; ऐसे अजनबी जो न तो सो पा रहे थे और न ही अपने कमरों से बाहर निकल पा रहे थे और न ही वे खुद और कुछ कर पा रहे थे।

लॉकडाउन के दौरान दादा का निधन हो गया, तो ऋषभ ने सितार बजाना छोड़ दिया था। बताते हैं कि लैपटॉप के साथ बैठा रहता था और बाहर नहीं निकलता था। जिस चीज़ ने उन्हें इस उदासी से बाहर निकाला, वह थी थेरेपी, और सितार। और तब मेरे मुँह से निकला, वाह! मैं अब तक कहाँ था। पहले जैसा सब हो पाने में ऐसे लोगों के सामने सितार बजा रहे थे, जिन्हें राग और आम रिंगटोन के बीच फर्क तक नहीं पता था। पर लोग उनके आलाप और झाला सुनने बैठ जाते थे, क्योंकि उनके अंदर कुछ तो था, जो उन्हें ऐसा करने के उकसा रहा था। इसी ने मानसिक स्वास्थ्य के लिए सितार को जन्म दिया, जो संगीत की दुनिया की पनाहगाह थी। अब इसका यह छठवां साल है। कहते हैं कि मैं यह दावा नहीं करता कि मैं कोई थेरेपिस्ट या इलाज करने वाला हूँ। मैं तो बस वही चीज़ें दूसरों तक पहुँचाता हूँ, जो मुझे खुद पसंद हैं। मेरे शो थेरेपी सेशन नहीं हैं। कहते हैं कि सितार में कोई कमी नहीं है। मुझे बस कूल प्रयोग पसंद है। वैसे तो हमें चाँद पर जाने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन चाँद पर जाना कूल है, है ना।

उनका ऐसा कहना शास्त्रीय संगीत के परंपरागत कलाकारों को बेचैन करता है तो कई को लुभाता है। जो लोग उनकी कला को तमाशा कहते हैं या मखौल उड़ाते हैं, उनसे बेखबर होकर ऋषभ, किशोरी अमोनकर और फ़ैशन डिज़ाइनर वर्जिल अबलोह के नाम देते हैं। कहते हैं कि "हमारे संगीत पर इतने हमले हुए हैं', मुझे अमोनकर की कही बात याद आती है, जब उन पर अपने घराने की सीमा से बाहर जाने का आरोप लगा था। फिर अबलोह की तरफ़ मुड़ते हैं कि “गैरेज में रखी टूटी मोमबत्ती होती है, लेकिन अगर आप उसे किसी म्यूज़ियम के बीच में रख दें, तो वह कलाकृति बन जाती है… आपको वह ‘माहौल’ बनाना पड़ता है।”

यह भी है कि जेन-जी से जुड़े सितार वादक के तौर पर उनमें दिखावटी कूल-गाय वाली लापरवाही नहीं है। जब उनसे पूछा गया कि सितार के अलावा वे क्या सुनते हैं, तो उन्होंने प्ले-लिस्ट दिखाई जिसमें कान्ये वेस्ट और डैनियल सीज़र से लेकर नुसरत फ़तेह अली खान तक थे। यह सहजता उन्हें अपने उस्तादों और पंडितों से मिली है, जिनके बारे में वे ज़ोर देकर कहते हैं कि उनका पूरा साथ मिला। वे बताते हैं , गुणीजनों ने मुझे बचपन से देखा है... मैं अपने नृत्य खुद ही कोरियोग्राफ़ करता था, हमेशा खास तरह से कपड़े पहनता था... सब मानते हैं कि मैं जो कुछ भी करता हूँ, वह ऋषभ के जैसा है। मुझे रियाज़ पर लौटने की याद भी दिलाते रहते हैं।

ये सवाल भी उठते रहे हैं कि क्या यह वेलने है, शास्त्रीय संगीत है, या फिर दोनों का मिला-जुला रूप, जिसमें राग को किसी सुगंधित तेल जैसा बना दिया है। और फिर भी, यह उनको अपनी ओर खींचता है जो शायद कभी दो घंटे चलने वाले शास्त्रीय संगीत में बैठ न पाते थे। कहते हैं कि मेरा मानना है कि कोई भी कला केवल ऐसा कहते रहने से कायम नहीं रह सकती, कि हम बस यही रट लगाते रहें कि हमारा संगीत मर रहा है, कृपया इसे बचा लीजिए। पुरानी शहीदी सोच से बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं। तपस्या करना अच्छी बात है, लेकिन बैंक खाते में पैसे भी तो होने चाहिए... आपको अपनी उस तपस्या में भी नए-नए प्रयोग करने होंगे। थैरेपी की भाषा बोलते हैं, तो मिलिट्री जैकेट, मेहंदी और खास तरह के जेवर पहन कर आते हैं। ऐसे लगता है जैसे वे किसी पीरियड ड्रामा या फैशन वीक में आए हों। दिल्ली में उन्होंने सोने का कवच पहना था। उन्होंने बताया कि “मेरा अगला प्रोजेक्ट ‘वेपंस ऑफ मास पीस’ कहलाएगा… इसलिए मेरे कपड़े भी उसी तरह के डिज़ाइन की भाषा बोलेंगे।

बताते हैं कि “मुझे हमेशा से सजने-संवरने का शौक रहा है… मेरे पास स्टाइल तो था, लेकिन शौक पूरा करने के लिए पैसे नहीं थे। पुरुष केवल शादी में ही सजते हैं। अब हर शो मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरी शादी हो रही हो। हँसते हुए कहते हैं कि मुझे हैरानी होती है कि मैं अपनी शादी में क्या पहनूंगा। कहते हैं कि इससे मुझे लगता है कि मैं अपना सबसे बेहतरीन दूंगा। राजा- महाराजा कैसे कपड़े पहनते थे, देखे स्कैच बनाए। मानते हैं कि उनके स्केच “बहुत खराब” होते हैं, लेकिन जाहिरन स्टेज पर आने से पहले डिज़ाइनर के हाथों से गुज़रते हैं। उनका मानना है कि “हमारे संगीत समारोह, त्योहारों जैसे होते हैं। लोग सजते-संवरते हैं, मेहंदी लगाते हैं। यह ‘कम्युनिटी’ है, जो इस विचार पर बनी है कि अगर लोगों को ‘बैठक’ तक नहीं ला सकते, तो उन तक ‘बैठक’ को ले जाएं जहां मौजूद हैं। इसीलिए उनका शो, कपड़े और सोशल मीडिया फ़ीड उतने ही मायने रखते हैं। वे कमरे में मौजूद लोगों के लिए परफॉर्मेंस देते हैं और कमरे में मौजूद फ़ोन के लिए भी। उन्हें यह मानने में कुछ दीगर नहीं लगता कि जिस ‘शू-शा’ (दिखावे) से कुछ लोग चिढ़ते हैं, वही चीज़ उन्हें बांधे भी रखती है। न ही ‘स्वैग’ नाम का एल्बम, मैगज़ीन के कवर, या कभी-कभार दिखने वाला प्राइवेट जेट कोई इत्तेफाक है। अपने तौर-तरीकों को न तो वे बेधड़क दिखाते हैं, न ही छिपाते हैं। कहते हैं कि सशक्त होने का तरीका है हाजिर करना… और मेरा मतलब शेखी बघारना बिलकुल नहीं है, बस इतना है कि कोई बच्चा या उसके माता-पिता यह देख सकें कि शास्त्रीय संगीत कितनी ऊंचाइयों तक ले जा सकता है।