मजहब नहीं सिखाता...!

यह बात अब शायद ही किसी की समझ में आए कि अजमेर शरीफ के उर्स में पहली कव्वाली हर बार शंकर शंभू की होती थी और सुनने के लिए लोग लालायित रहते थे। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब के दिन की शुरुआत ही काली मंदिर के दर्शन से होती थी। ‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज...’ गीत गाने वाले मोहम्मद रफी हैं तो संगीतकार नौशाद और गीतकार शकील बदायूंनी। किसे याद है कि दिलीप कुमार का असली नाम युसूफ खान था। संजय खान नाम क्या आज कोई रख सकता है? मीना कुमारी या मधुबाला आज संभव है? सागर सरहदी को कितने लोग सागर सिंह तलवार के नाम से जानते हैं? अभी ही खबर छपी है कि कलावे बनाने का बड़ा काम मुस्लिम करते हैं और मथुरा की जन्माष्टमी के लिए मुस्लिम परिवार पोशाख तैयार करता है। ये सब होता रहा है आजादी के बाद से अब तक। अभी विदेश दौरे के समय संघ मुखिया मोहन भागवत ने यह जताने की कोशिश की कि सभी के सहयोग से ही देश की तरक्की संभव है और यह भी कि भारत में सभी धर्म, व्यक्ति, समाज समान हैं... तो फिर जब सहयोगी दल का व्यक्ति ही इस तरह की बातें करता है कि भेदभाव की चिरमिराती गंध आती है तो फिर क्यों नहीं उसे रोका जाता या उसके खिलाफ कार्रवाई होती या विरोध ही दर्ज कराया जाता? अभी भोपाल के विधायक ने कहा है कि गरबों में यदि मुस्लिम आना चाहते हैं तो बहनों को साथ लेकर आएं या यह शर्त लगाई जा रही है कि हर एक को पहले तिलक लगाना होगा, फिर अंदर आने देंगे। महिला विधायक का तो यह सालाना ऐलान है कि हमारी लड़कियों को मुस्लिम बहका कर ले जाते हैं गरबों के दौरान। तो क्या मुस्लिम लड़कियां नहीं आती हैं गरबों में? क्या लड़कियां इतनी नासमझ हैं कि जरा से बहकावे में साथ चली जाएंगी? क्या सिर्फ गरबों के दौरान ही साथ जाने का रिवाज है? जब करीना कपूर शादी करती है सैफ अली खान से तो किसी गरबे की वजह से? उनकी शादी पर कोई ऐतराज नहीं, लेकिन आम की राजी-मर्जी में बहकावा नजर आता है!
पत्रकार और लेखक सईद नकवी का उपन्यास है- ‘द मुस्लिम वैनिशेस’ यानी जब कोई मुस्लिम नहीं होगा, तब दलित, पिछड़ी जाति और आदिवासी निशाने पर होंगे, क्योंकि हिंदू राष्ट्र की कल्पना तो तभी साकार हो सकती है ना! फिर क्या हिंदुओं में सभी एक तरह के होंगे, तब भी ऊंच-नीच और फर्क तो जताया और बताया जाएगा ना। जिन्हें कभी अछूत कहा गया, आज हिंदू कह रहे हैं, जबकि उनका विरोध है कि हम नहीं हैं। त्यौहार-उत्सव तो आपसी प्रेम के लिए होते हैं। बारह साल पहले यह शोर क्या सिर्फ इसलिए नहीं था कि जब सत्ता में होते हैं तो ही नफरत की आवाज निकलती है? बंगाल में सरकार पलटते ही मछली पर बहस शुरू हो गई और अब सरकार को घुटनों पर आना पड़ा है। सत्ताधारी दल के अपने गणित हैं, लेकिन आमजन को समझने की जरूरत है कि हम उनके जाल में नहीं फंसें और जो भेदभाव की बातें करते हैं, उन्हें प्रेम से जवाब दें।